जन्म से लेकर मृत्यु तक का सफर : घट्टी गीत


वह जन्म से लेकर मृत्यु तक का सफर अपने गीतों के माध्यम से करती है और अपने अहंकार को प्रति दिन आटे की तरह झराती है

पवारन मां गांव में अपने घर पर घट्टटी का उपयोग करते गीत गाते हुए

मुलतापी समाचार, मनमोहन पंवार (संपादक)

घट्टी में अनाज पीसने वाली महिला घट्टी में केवल अनाज ही नहीं पीसती वह अपने दुःख दर्द भी पीस डालती है, अंधकार भी पीस डालती है ।
जिन घट्टी गीत को सुनकर घर के सदस्य सोकर उठते थे अब घट्टी के वे स्वर सुनाई नहीं देते। घट्टी दो पाटों का एक ऐसा अदभूत समन्वय है जिसमें एक पाट स्थिर और दूसरा चलायमान होता है। स्थिर पाट परंपरा का परिचायक होता है और चलायमान पाट गति या विकास का। विकास वही उपादेय माना जाता है जो परंपरा से जुड़ा हो। आदमी के दो पैर परंपरा और गति के परिचायक है। एक पैर स्थिर होता है या जमीं पर टिका होता है तभी दूसरा पैर आगे बढ़ने के लिए उठ पाता है। चलने या आगे बढ़ने का यही नियम है। केवल परंपरा ही परंपरा या केवल विकास ही विकास जीवन को गत और गति प्रदान नहीं कर पाते। घट्टी जीवन को गत और गति प्रदान करने का प्रतीक है। गांव के हर घर में घट्टी की व्यवस्था जीवन को गत और गति प्रदान करने की चाह का परिणाम है। घट्टी न केवल घर के सदस्यों को ताज़ा और स्वास्थय वर्धक आटा प्रदान करती है अपितु अनाज पीसने वाली के होठों को गीत भी प्रदान करती है। यही गीत उसके मीत बन जाते हैं।

घट्टी के गोलाकार घूमते पाट के साथ अनाज पीसने वाली महिला अपने जीवन की पूरी परिक्रमा भी कर लेती है। जन्म से मृत्यु तक की पूरी यात्रा वह घट्टी के घूमते पाटों के साथ पूरा करती है। अनाज पीसते-पीसते वह अपने मायके,अपने गांव भी पहुँच जाती है। वह अपने भाई बहनों से भी मिल आती है और अपनों की मृत्यु से होने वाली पीड़ा भी वह स्वयं भोग लेती है। घट्टी में अनाज पीसने वाली महिला घट्टी में केवल अनाज ही नहीं पीसती वह अपने दुःख दर्द भी पीस डालती है, अंधकार भी पीस डालती है। और यह सब सफ़ेद झक आटे के लिए ही नहीं अपितु सफ़ेद झक दिन और सफ़ेद झक भाग्य की उम्मीद में करती है। घट्टी से झरता आटा और होठों से झरते गीत का ऐसा समन्वय स्थापित होता है कि सुनने वाला और सुनाने वाला दोनों ही भाव विभोर हो जाते है। पूरा घर सुर और संगीत से सराबोर हो उठता है। चलती घट्टी सुखद और उजले दिन की आराधना और आरती करती प्रतीत होती है और सूरज को गरमा गरम आटे का अर्ध्य चढाती प्रतीत होती है।

घट्टी सुर ताल और संगीत के साथ योग का अदभूत समन्वय प्रस्तुत करती है। घट्टी चलाते समय गाये जाने वाले गीत कर्म और करुणा के गीत होते हैं। तीन से लेकर दस पंक्ति तक गाये जाने वाले ये गीत से गाने वाली महिला इतना एकाकार हो जाती है कि दरना उसका दर्द नहीं अपितु दवा बन जाता है। इन गीतों में माँ अक्सर अपनी विवाहित बेटियों को गाती है और उनके मधुर स्मरण को गीत समर्पित करती है।
जैसे -पांच बोटी की चिमटिन,काशी का हिमतीन ,दरना दरय पस्या की लगय धारी ,पाज्यो काशी न दूध मरी। तात्पर्य यह है कि बेटी काशी को दरना दरते समय पसीने की धार लगी है और वह अपनी संतान को गोद में लिए दूध पिला रही है।

इन गीतों में बहनें अपने भाई बहन के नाम लेकर भी गीत गाती है ,जैसे -दूर को पल्ला पड़य ,बैनी साथी जानू पड़य ,बन्धुजी आला नेउ ,बंधू का भोजनी ,सासू कहा चा रान्धू वाडु ,मोती चूर का बांधू लाडू। इस गीत में दूर रह रही बहन को लेने भाई उसकी ससुराल जाता है तो बहन अपने भाई के भोजन के लिए अपनी सास से पूछती है क्या बनाऊं?, मोती चूर के लड्डू बाँधू? भाई के प्रति बहन का यह प्रेम बेजोड़ है।

पति पत्नी के मधुर संबंधों पर एक गीत देखिये -पति न हाका मारी ,कवाड़ा आड़ून ,सोन्या का सरोता न देली सुपारी फोडून। इस गीत में पति मर्यादा का पालन करते हुए दरवाजे की ओट से अपनी पत्नी को पुकार रहा है और पत्नी सोने के सरोते से सुपारी फोड़ कर अपने पति को देती है।

घट्टी गीत करुणा से ओतप्रोत होते है। इनमें मरण को लेकर भी गीतों की भरमार होती है। जैसे -मरा मरना ले जन बसले नयी थड़ी ,मरा सत्ता का मारय बूड़ी ,मरा मरना ख देवर भासरा एक गोत,मरा बंधुजी तिराहीत ,बसले आंगणीत। इसमें कहा गया है कि मेरे मरने पर लोग नदी किनारे बैठे है और मेरे घर वाले डुबकी लगा रहे हैं जबकि मेरे मायके से आये मेरे भाई बंधु किसी पराये व्यक्ति की तरह अलग थलग बैठे हुए है।

मरण गीत का एक और उदाहरण देखिये -अब पिता का मरना ले अब नयी का पयलि पार ,पिता की सरवन जलय ,अगासी धुँआ डाटय,बारा को हिरदा भरय ,नितरि पानी पड़य। गीत का भाव बड़ा कारुणिक है कि पिता के मरने पर पिता की चिता जल रही है और धुँआ आसमान में उठ रहा है। बेटे का दिल भर आया है और आँखों से आंसुओं की धार टपक रही है।

घट्टी के घूमने के साथ दरना दरने वाली महिला भी अपने जीवन चक्र का पूरा चक्कर लगा लेती है। वह जन्म से लेकर मृत्यु तक का सफर अपने गीतों के माध्यम से करती है और अपने अहंकार को प्रति दिन आटे की तरह झराती है ताकि उसका मरण सुखद हो सके। दरना दरने के बाद वह इतनी तरोताजा महसूस करती है कि अपना कठिन जीवन भी उसे मधुर और प्रिय लगने लगता है। वह घट्टी के माध्यम से सभी देवी देवताओं और अपने पूर्वजों को हर रोज ताजे आटे का अर्ध्य चढ़ाती है ताकि उसपर कोई ऋण शेष न रह जाए और उसका मरण उत्सव बन जाए।

जन्म और मृत्यु दोनों अवसर के लिए गीत रचना और लोक जीवन में उनका प्रयोग बोली की विविधता तो दर्शाती ही है यह भाषा बनने की अपनी क्षमता भी प्रदर्शित करती है।

टेकड़ी उप्पर बाजा बजय ——-
भाई घर भतीजा आयो ——-
मृत्यु के समय जिस बैलगाड़ी पर अंतिम संस्कार हेतु ईंधन ले जाया जाता है उन बैलों को भी भोजन कराया जाता है ताकि मृतक उनके ऋण से उऋण हो सके।लोक जीवन में मृत्यु के बाद के उत्तर कर्म की परम्परा ऋण से उऋण होने का महज उपक्रम माना है।
वल्लभ डोंगरे,सुखवाड़ा

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