MP संकट: SC में बोले स्पीकर- सरकार बहुमत खो चुकी है या नहीं, आज फ्लोर टेस्ट


मुलतापी समाचार

MP मध्य प्रदेश के सियासी संकट पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। फ्लोर टेस्ट कराने की मांग वाली शिवराज सिंह चौहान और अन्य की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को काफी देर तक सुनवाई चली, मगर कोर्ट ने कोई फैसला नहीं दिया। हालांकि, इस दौरान कोर्ट ने यह संवैधानिक कर्तव्यों का हवाला देकर कहा कि वह फ्लोर टेस्ट में दखल नहीं देगा, क्योंकि उसका काम यह तय करना नहीं है कि सदन में किसके पास बहुमत है या नहीं। यह काम विधायिका का है। 

इससे पहले बुधवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि कमलनाथ सरकार की किस्मत 16 बागी विधायकों के हाथों में है। कोर्ट ने कहा कि वह विधानसभा द्वारा यह तय करने के बीच में दखल नहीं देगी कि किसके पास विश्वासमत है। अदालत ने कहा कि उसे यह सुनिश्चित करना है कि बागी विधायक स्वतंत्र रूप से अपने अधिकार का इस्तेमाल करें। 

MP Government Floor Test Hearing in Supreme Court LIVE Updates:

– मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष ने न्यायालय से कहा कि राज्यपाल के पास केवल तीन शक्तियां हैं: सदन कब बुलाना है, कब स्थगित करना है और भंग करना। 

– मध्य प्रदेश राजनीतिक संकट: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या अध्यक्ष बागी विधायकों से वीडियो लिंक के जरिए मुलाकात कर फैसला ले सकते हैं? अध्यक्ष ने न्यायालय से कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकते।

-मध्य प्रदेश राजनीतिक संकट: विधानसभा अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अदालत बागी विधायकों के इस्तीफे पर फैसला लेने के लिए उन्हें दो सप्ताह जितना पर्याप्त समय दे।

मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय भी अध्यक्ष के अधिकार को निरस्त नहीं कर सकता। 

– शिवराज सिंह के मध्य प्रदेश में फ्लोर टेस्ट कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई शुरूANI@ANI

Supreme Court upholds the validity of the Karnataka’s 2018 reservation law for granting reservation in promotion to SC/ST (Scheduled Castes and the Scheduled Tribes) employees.

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-सुप्रीम कोर्ट में मध्य प्रदेश के सियासी संकट पर आज सुबह 10.30 बजे सुनवाई होगी। 

बुधवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ
न्यायालय ने मध्य प्रदेश कांग्रेस के बागी विधायकों से न्यायाधीशों के चैंबर में मुलाकात करने की पेशकश को ठुकराते हुये कहा कि विधानसभा जाना या नहीं जाना उन पर (विधायकों) निर्भर है, लेकिन उन्हें बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता। कांग्रेस के 22 बागी विधायकों के इस्तीफे की वजह से मध्य प्रदेश में उत्पन्न राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है, जिससे संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने यह टिप्पणी की।

सुप्रीम कोर्ट ने इन विधायकों का चैंबर में मुलाकात करने की पेशकश यह कहते हुए ठुकरा दी कि ऐसा करना उचित नहीं होगा। यही नहीं, पीठ ने रजिस्ट्रार जनरल को भी इन बागी विधायकों से मुलाकात के लिये भेजने से इंकार कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के नौ विधायकों के अलावा मध्य प्रदेश कांग्रेस विधायक दल की याचिकाओं पर सुनवाई बृहस्पतिवार सुबह साढ़े दस बजे तक के लिये स्थगित कर दी। 

हमारा काम कर्तव्य का निर्वरण करना: पीठ ने कहा, ‘संवैधानिक न्यायालय होने के नाते, हमें अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना है और इस समय की स्थिति के अनुसार वह यह जानती है कि मध्य प्रदेश में ये 16 बागी विधायक पलड़ा किसी भी तरफ झुका सकते हैं।’ न्यायालय ने इस मामले के अधिवक्ताओं से अनुरोध किया कि वे विधायकों के विधानसभा तक निर्बाध रूप से पहुंचने और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का तरीका तैयार करने में मदद करें। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सभी बागी विधायकों को न्यायाधीशों के चैंबर में पेश करने का प्रस्ताव रखा जिसे न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया। विपक्षी भाजपा ने 15 महीने पुरानी कमलनाथ सरकार का तत्काल शक्ति परीक्षण कराने की मांग की है।

मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष एन पी प्रजापति ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि दलबदल कानून को नाकाम करने और एक निर्वाचित सरकार को गिराने के लिए सत्तारूढ़ विधायकों के इस्तीफे सुनिश्चित कराकर एक नये तरह के ‘जुगाड़’ का आविष्कार किया गया है। अध्यक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ए एम सिंघवी ने पीठ को बताया कि राजीव गांधी सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए दल-बदल विरोधी कानून बनाया था कि जनप्रतिनिधि अपना पक्ष बदलकर लोकप्रिय जनादेश की उपेक्षा न करें।

बेंगलुरु के एक रिजॉर्ट में ठहरे मध्य प्रदेश कांग्रेस के बागी विधायकों का कहना है कि वे पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह से नहीं मिलना चाहते, जो उनसे मिलने के लगातार प्रयास कर रहे हैं। बागियों ने अपने वीडियो संदेश में कहा, ‘हमें पता चला है कि दिग्विजय सिंह कुछ मंत्रियों और नेताओं के साथ आए हैं। वे बेवजह प्रवेश द्वार पर कह रहे हैं कि उन्हें हम से मिलना है। जबकि कोई विधायक उनसे मिलना नहीं चाहता। उन्हें यह सब नहीं करना चाहिए। सभी विधायकों ने अपना इस्तीफा दे दिया है।’ 

कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट की फटकार: उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान रोहतगी ने कांग्रेस की याचिका की विचारणीयता पर सवाल उठाया और कहा कि एक राजनीतिक दल अपनी याचिका में बागी विधायकों से मुलाकात का अनुरोध कैसे कर सकता है। उन्होंने कहा कि समस्या यह है कि कांग्रेस चाहती है कि बागी विधायक भोपाल जायें ताकि उन्हें लुभाया जा सके और वह खरीद फरोख्त कर सके। बागी विधायकों ने भी पीठ से कहा कि वे संविधान के प्रावधान के अनुरूप किसी भी नतीजे का सामना करने के लिये तैयार हैं। इन विधायकों ने कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात करने से इंकार करते हुये कहा कि उनकी ऐसी इच्छा नहीं है। बागी विधायकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनिन्दर सिंह ने कहा, ‘अध्यक्ष हमारे इस्तीफे दबाकर नहीं बैठ सकते। क्या वह कुछ इस्तीफे स्वीकार कर सकते हैं और बाकी अन्य को नहीं कर सकते हैं क्योंकि राजनीतिक खेल चल रहा है।’

इससे पहले दिन में सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश कांग्रेस पार्टी ने न्यायालय से आग्रह किया कि राज्य विधानसभा में रिक्त हुये स्थानों के लिये उपचुनाव होने तक सरकार के विश्वास मत साबित करने की प्रक्रिया स्थगित की जाये। कांग्रेस ने यह भी दलील दी कि अगर उस समय तक कमलनाथ सरकार सत्ता में रहती है तो आसमान नहीं टूटने वाला है।

इससे आसमान नहीं गिरने वाला है: कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा, ‘यदि उपचुनाव होने तक कांग्रेस सरकार को सत्ता में बने रहने दिया जाता है तो इससे आसमान नहीं गिरने वाला है और शिवराज सिंह चौहान की सरकार को जनता पर थोपा नहीं जाना चाहिए।’ दवे का कहना था कि राज्यपाल को सदन में शक्ति परीक्षण कराने के लिये रात में मुख्यमंत्री या अध्यक्ष को संदेश देने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा, ”अध्यक्ष सर्वेसर्वा है और मध्य प्रदेश के राज्यपाल उन्हें दरकिनार कर रहे हैं।    

बीजेपी का प्रतिवाद: चौहान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इस तर्क का जबर्दस्त प्रतिवाद किया और कहा कि कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफे, जिनमें से छह इस्तीफे स्वीकार किये जा चुके हैं, के बाद राज्य सरकार को एक दिन भी सत्ता में बने रहने नहीं देना चाहिए। रोहतगी ने आरोप लगाया कि 1975 में आपात काल लगाकर लोकतंत्र की हत्या करने वाली पार्टी अब डा बी आर आम्बेडकर के उच्च सिद्धांतों की दुहाई दे रही है।

मध्य प्रदेश कांग्रेस विधायक दल ने मंगलवार को शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर अनुरोध किया था कि उसके बागी विधायकों से संपर्क स्थापित कराने का केन्द्र और कर्नाटक की भाजपा सरकार को निर्देश दिया जाये। कांग्रेस का कहना है कि उसके विधायकों को बेंगलुरु की एक रिसॉर्ट में रखा गया है।

इससे पहले, मंगलवार की सुबह न्यायालय ने शिवराज सिंह चौहान और नौ अन्य भाजपा विधायकों की याचिका पर कमलनाथ सरकार से बुधवार की सुबह साढ़े दस बजे तक जवाब मांगा था। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा 16 मार्च को राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद सदन की कार्यवाही 26 मार्च तक के लिये स्थगित किये जाने पर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के नौ विधायकों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी।

भाजपा ने इस याचिका में अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और विधानसभा के प्रधान सचिव पर संविधान के सिद्धांतों का उल्लंघन करने और जानबूझ कर राज्यपाल के निर्देशों की अवहेलना करने का आरोप लगाया था। राज्यपाल लालजी टंडन ने शनिवार की रात मुख्यमंत्री को संदेश भेजा था कि विधानसभा के बजट सत्र में राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद सदन में विश्वास मत हासिल किया जाये क्योंकि उनकी सरकार अब अल्पमत में है।

अध्यक्ष द्वारा कांग्रेस के छह विधायकों के इस्तीफे स्वीकार किये जाने के बाद 222 सदस्यीय विधान सभा में सत्तारूढ़ दल के सदस्यों की संख्या घटकर 108 रह गयी है। इनमें वे 16 बागी विधायक भी शामिल हैं जिनके इस्तीफे अभी स्वीकार नहीं किये गये हैं। राज्य विधानसभा में इस समय भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों की संख्या 107 है।

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