भुजलिया विषमताओं और विपिन्नताओं में भी साहस बनाएं रखने और जीवटता के साथ जीवन जीने का प्रतीक पर्व


मुलतापी समाचार

भुजलिए से जुड़ना वीर संस्कृति से जुड़े होने का प्रमाण है। वीर विक्रमादित्य से लेकर भोज तक हमें अनेकों वीर पूर्वजों के वंशज होने का सौभाग्य प्राप्त है

वीर मरने पर भी अजर-अमर होते हैं , उनका मरण भी पर्व हो जाता है, भुजलिया पर्व यही सिखाता है।
भोपाल।भुजलियां (बाहुड़ल्या,भुजरियां, कजलियां) विषमताओं और विपिन्नताओं में भी साहस बनाएं रखने और बिना किसी शिकवे- शिकायत के पूरी वीरता और जीवटता के साथ जीवन जीने का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंधेरे में,बिना प्रकाश और हवा के अंकुरित होकर बढ़ने और अभावों में भी जीने की भुजलियों की जिजीविषा हमारे जीवन का प्रतिनिधित्व करती, हमारे काफी करीब प्रतीत होती है । उनकी इसी विशेषता के कारण समाज में उन्हें पूजा जाता है, सर- आंखों पर बिठाया जाता है और हाथों हाथ लिया जाता है।

भुजलिए को राखी के पाड़वे पूजा जाता है,बहन बेटियां सिर पर रखकर गली और गांव में खुशी प्रदर्शित करती हैं। शाम को किसी जल स्रोत पर जाकर उन्हें विसर्जित कर खुटती हैं। और खुटे भुजलिए परस्पर एक दूसरे के सिर पर रखकर ,कान में खोंचकर या हाथों में देकर परस्पर शुभकामनाओं और आशीर्वाद का आदान-प्रदान किया जाता है। वीर मरने पर भी अजर-अमर होते हैं , उनका मरण भी पर्व हो जाता है, भुजलिया पर्व यही सिखाता है।

भुजलिएं वीर संस्कृति का द्योतक हैं।अपनी बहन की रक्षा के लिए भाई द्वारा प्राणोंत्सर्ग कर देने का प्रतीक पर्व हैं। वीरता ही मनुष्य का आभूषण होती है और वीर ही पूजे जाते हैं। वीरता के कारण ही आल्हा ऊदल की वीरता का घर घर पाठ किया जाता है।

भुजलिए से जुड़ना वीर संस्कृति से जुड़े होने का प्रमाण है। वीर विक्रमादित्य से लेकर भोज तक हमें अनेकों वीर पूर्वजों के वंशज होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है ।बहन को सम्मान देने और उसे अपने प्राणों से भी प्रिय मानने का प्रतीक पर्व भुजलिया आज भी भाई बहन के अटूट प्रेम को प्रदर्शित करता है।

नागपंचमी पर्व के पाड़वे से याने कि भुजलिया बोने के दिन से बहन बेटियों के घर मायके से रोटी के साथ पिठौरा भेजने की प्रथा भाई बहन के अटूट विश्वास और प्रेम का प्रतीक हैं।

परम्पराएं परस्पर प्रीत जगाती हैं, संबंधों में प्रगाढ़ता लाती है । भुजलिया और राखी पर्व इसके जीते-जागते प्रमाण हैं। आज भी हमारे घरों में सावन के महीने भर आल्हा ऊदल की वीरता का पाठ किया जाता है और उनसे प्रेरणा ली जाती हैं। आल्हा खंडों का वाचन वीरता का सम्मान है। और यह सम्मान केवल वीर पुरुष ही दे पाते हैं।
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