सच्ची मित्रता की निशानी — पांच रुपये में ली मित्र की लाठी को 45 साल से रखा संभाल कर


बैतूल। उनकी मित्रता न तो सुदामा कृष्ण की तरह है न ही वे दुर्योधन कर्ण की तरह वचनबद्ध मित्रता के प्रमाण रहे। बैतूल जिला मुख्यालय ये 9 किमी की दूरी पर बसे पंवार जाति बाहुल्य ग्राम रोंढा जिले की सबसे प्राचीन ग्राम में से एक है। चारो-ओर हरे भरे खेतों से घिरे इस गांव में मनोहरी डिगरसे और मंहग्या भोभाट नामक दो व्यक्ति रहा करते थे। मंहग्या भोभाट ने 30 सालो तक रोंढा सहित आसपास के दो दर्जन से अधिक गांवों में हाथ से कुआ की खुदाई का काम करते थे। गांव में दो एकड जमीन के मालिक स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट के परदादा स्वर्गीय भिख्या जी महाजन 40 बीघा जमीन के मालगुजार थे। समयकाल के परिवर्तन के कारण ठेका पर कुआ खोदने वाले मंहग्या भोभाट ने अपने एक मित्र को आज से 45 साल पहले मात्र 5 रूपये में एक बांस की लाठी जिसके मत्था पर पीतल का कवर चढा हुआ है वह बेच दी थी। महंग्या जी भोभाट के निधन के बाद 45 साल से मनोहरी डिगरसे अपने मित्र की दी नाम की निशानी बांस की वह लाठी लेकर संग संग चलते है।

कैसे बनती थी बांस की लाठी — वर्ष 60 से 70 के दशक में बांस की लाठी के सीधा करने के लिए लोहे की जाली में लाठी को रख कर उसके सीधा होने के बाद इस पर डिजाइन तैयार की जाती हैं। इस डिजाइन को तैयार करने के लिए एक विशेष प्रकार की कलाकारी करनी पड़ती। लाठी पर पीतल का कवर चढाने के बाद उस नाम लिखा जाता था। सही बांस का चयन कर उसे जंगल से काटकर लाने के बाद धुप में सूखने के लिए छोड़ दिया जाता हैं। कड़ी धूप मे चार से पांच दिन में सूख जाता हैं। बांस के सूखने के बाद इसकी घिसाई एवं सफाई की जाती हैं। ताकि बाद में पकड़ते समय हाथों में बाँस की फांस ना लग जाए।

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