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बैतूल जिले के पंवारों का इतिहास


क्षत्र‍िय पवार समाज संगठन बैैैैैतूल द्वारा राजा भोज जयंती एंव बसंंत पंचमी का कार्यक्रम बैतूल में मनाया सभी सममान्‍नीय सामाजिक बंधु गंण उपस्‍थ‍ि‍त हुए

मनमोहन पंवार

मुलतापी समाचार

बैतूल जिले में भाट के मतानुसार पंवार समाज के पूर्वज लगभग विक्रय संवत 1141 में धारा नगरी धार से बैतूल आए थे। जिले में लगभग पंवारों के 200 गांव है। पंवारों की संख्या लाखों में है। बैतूल जिले के पंवार अग्निवंशी है, इनका गोत्र वशिष्ठ है, प्रशाखा प्रमर या प्रमार है। ये पूर्ण रूप से परमार (पंवार) राजपूत क्षत्रिय है। वेद में इन जातियों को राजन्य और मनोस्मृति में बाहुज, क्षत्रिय, राजपुत्र तथा राजपूत और ठाकुरों के नाम से संबोधित किया है। सभी लोग अपने भाट से अपने वास्तविक इतिहास की जानकारी अवश्य लें ताकि आने वाली पीढ़ी को भविष्य में यह पता रहे कि वे कौन से पंवार है उनका गोत्र क्या है? हमारे वंश के महापुरूष कौन है। जब मालवा धार से पंवार मुसलमानों से युद्ध करते हुए नर्मदा तट तक होशंगाबाद पहुंचे वहां उस समय कि परिस्थितियों के कारण सभी लोगों ने अपने जनेऊ उतारकार नर्मदा में डाल दिए थे।

भाट लोगों के अनुसार ये सभी परमार शाकाहारी थे, मांस मदिरे का सेवन नहीं करते थे। वेदिक सोलह संस्कारों को अपनाते थे किंतु समय और विषम परिस्थितियों के कारण सेना के इस समूह की टुकडिय़ां क्रमश: बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट, मंडला, जबलपुर, रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव, भिलाई, दुर्ग तथा महाराष्ट्र के नागपुर, भंडारा गोंदिया, तुमसर, वर्धा, यवतमाल, अमरावती, बुलढाना आदि जिलों में जाकर बस गए। बैतूल और छिंदवाड़ा के पंवारों को उस समय यहां रहने वाली जातियों के लोगों ने अपनी बोली से भुईहर कहा जो अपभ्रंस होकर भोयर कहलाये। उस समय की भोगौलिक परिस्थिति तथा आर्थिक मजबूरियों के कारण ये समस्त पंवार अपने परिवार का पालन पोषण करने के चक्कर में अपने मूल रीति रिवाज और मूल संस्कार भूलते चले गए। सभी ओर क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव बढ़ गया इसलिए इन सभी क्षेत्रों में वहां की स्थानीय भाषा का अंश पंवारों की भाषा में देखने आता है

किंतु आज भी पंवार समाज की मातृभाषा याने बोली में मालवी भाषा और राजस्थानी भाषा के अधिकांश शब्द मिलते है। सैकड़ों वर्षो के अंतराल के कारण लोगों ने जो लोकल टाइटल (पहचान) बना ली थी वो कालांतर में गोत्र के रूप में स्थापित हो गई। आज प्रचलित सरनेम को ही लोग अपना गोत्र मानते है जबकि गोत्र का अभिप्राय उत्पत्ति से है और सभी वर्ण के लोगों की उपत्ति किसी न किसी ऋषि के माध्यम से ही हुई है। हमें गर्व है कि हमारी उत्पत्ति अग्निकुंड से हुई है। और हमारे उत्पत्ति कर्ता ऋषियों में श्रेष्ठ महर्षि वशिष्ठ है, इसलिए हमारा गोत्र वशिष्ठ है।

बैतूल जिले के पंवार मूलत: कृषक है। अब युवा पीढ़ी के लोग उद्योग धंधे में तथा नौकरियों में आ रहे है। शिक्षा के अभाव के कारण यहां के पंवार समाज के अधिकांश लोग आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए है। इस समाज में पहले महिलाएं शिक्षित नहीं थी किंतु अब महिला तथा पुरूष दोनों ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर उच्च पदों पर आसीन है। समाज के उच्च शिक्षित लोग सभी क्षेत्र में बड़े-बड़े महत्वपूर्ण पदों पर और विदेशों में भी समाज का गौरव बढ़ा रहे है। कृषक भी आधुनिक विकसित संसाधनों से उन्नत कृषि व्यवसाय में लगे हुए है।

बैतूल जिले के पंवारों के गांव की सूची

बैतूल क्षेत्र के गांव

1. बैतूल नगरीय क्षेत्र 2. बैतूलबाजार नगरीय क्षेत्र, 3. बडोरा 4. हमलापुर, 5. सोनाघाटी, 6. दनोरा, 7. भडूस, 8. परसोड़ा 9. ढोंडबाड़ा, डहरगांव, बाबर्ई, डोल, महदगांव, ऊंचागोहान, रातामाटी, खेड़ी सांवलीगढ़, सेलगांव, रोंढा, करजगांव, नयेगांव, सावंगा, कराड़ी, भोगीतेढ़ा, भवानीतेढ़ा, लोहारिया, सोहागपुर, बघोली, सापना, मलकापुर, बाजपुर, बुंडाला, खंडारा, बोड़ीबघवाड़, ठेसका, राठीपुर, खेड़ी भैंसदेही, शाहपुर, भौंरा, घोड़ाडोंगरी,सलैया, पाथाखेड़ा, शोभापुर, सारणी क्षेत्र, भारत भारती, जामठी, बगडोना, झगडिय़ा, कड़ाई, मंडई, गजपुर, बाजपुर, पतरापुर, सांपना, खेड़लाकिला, चिखल्या (रोंढा), कोरट, मौड़ी, कनाला, बयावाड़ी

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मुलताई क्षेत्र के गांव – मुलताई नगरीय क्षेत्र, थावर्या, कामथ, चंदोराखुर्द, करपा, परसठानी, देवरी, हरनया, मेलावाड़ी, बूकाखेड़ी, चौथिया, हरदौली, शेरगढ़, मालेगांव, कोल्हया, हथनापुर, सावंगा, डउआ, घाट बिरोली, बरखेड़, पिपरिया, डोब, सेमरिया, पांडरी सिलादेही, जाम, खेड़ी देवनाला, चिचंडा, निंबोरी चिल्हाटी, कुंडई, खंबारा, मल्हारा, कोंढर, जूनापानी, सेमझर, डहरगांव, चैनपुर, तुमड़ी, डोल, मल्हाराखापा, पिपरपानी, नीमदाना, व्हायानिडोरनी, छोटी अमरावती, छिंदखेड़ा, गाडरा, सोमगढ़, झिलपा, नंदबोही, दुनावा, दुनाई, गांगई, मूसाखापा, खल्ला, सोनेगांव, सिपावा, भैंसादंड, मलोलखापा, बालखापा, घाट पिपरिया, सरई, काठी, हरदौली, लालढाना, खामढाना, लीलाझर, बिसखान, मयावाड़ी, थारी, मुंडापार, चिखलीकला, कपासिया, लाखापुर, हिवरा, पारबिरोली, खैरवानी, सावंगी, लेंदागोंदी, मोरखा, तरूणाबुजुर्ग, डुडरिया, पिडरई, जौलखेड़ा, मोही, हेटीखापा, परमंडल, नगरकोट, दिवट्या, बुंडाला, हेटी, खतेड़ाकला, हरनाखेड़ी, अर्रा, बरई, जामुनझिरी, टेमझिरा, बाड़ेगांव, केकड्या, ऐनस, निर्गुण, सेमझिरा, पोहर, सांईखेड़ा, बोथया, ब्राम्हणवाड़ा, खेड़लीबाजार, बोरगांव, बाबरबोह, महतपुर, माथनी, छिंदी, खड़कवार, केहलपुर, तरोड़ा बुजुर्ग, सोड्ंया, रिधोरा, सोनोरी, सेमरया, जूनावानी, चिचंडा, हुमनपेट, बानूर, खेड़ी बुजुर्ग, उभारिया, खापा, नयेगांव, ससुंद्रा, पंखा, अंधारिया,

आमला नगरीय क्षेत्र – जंबाड़ा, बोडख़ी, नरेरा, छिपन्या, पिपरिया, महोली, उमरिया, सोनेगांव, बोरदेही, चिचोली, भैंसदेही, गुबरैल, डोलढाना आदि।

बैतूल जिले के वर्तमान में पंवारों के भिन्न-भिन्न सरनेम, उपनाम जिसे आज ये लोग गोत्र कहते है।

परिहार या पराड़कर, पठाड़े, बारंगे, बारंगा, बुआड़े, देशमुख, खपरिए, पिंजारे, गिरहारे, चौधरी, चिकाने, माटे, ढोंडी, गाडरी, कसारे, कसाई, कसलिकर, सरोदे, ढोले, ढोल्या, बिरगड़े, उकड़ले, रोलक्या, किरणकार, किनकर, किरंजकार, घाघरे, रबड़े, रबड्या, भोभाट, दुखी, बारबुहारे, मुनी, बरखेड्या, बागवान, देवासे, देवास्या, फरकाड्या, फरकाड़े, नाडि़तोड़, भादे, भाद्या, कड़वे, कड़वा, कोडले, रमधम, राऊत, रावत, करदात्या, करदाते, हजारे, हजारी, गाड़क्या, गाकरे, खरफुस्या, खौसी, खवसे, कौशिक, पाठेकर, पाठा, मानमोड्या, मानमोड़े, हिंगवे, हिंगवा, डालू, ढालू, डहारे, डोंगरदिए, डोंगरे, डिगरसे, गोहिते, ओमकार, उकार, टोपल्या, टोपले, गोंदर्या, धोट्या, धोटे, ठावरी, ठूसी, लबाड़, ढूंढाड्या, ढोबारे, गोर्या, गोरे, काटोले, काटवाले, आगरे, डोबले, कोलया, हरने, ढंडारे, ढबरे, तागड़ी, सेंड्या, खसखुसे, गढढे, वाद्यमारे, सबाई।

सिवनी, बालाघाट, गोंदिया, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ में प्रचलित सरनेम – अम्बूल्या, आमूले, कटरे, कटरा, कोलहया, गौतम, चौहान, चौधरी, चैतवार, ठाकुर, टेम्भरे, टेम्भरया, डाला, तुरूस, तुरकर, पटले, पटलया, परिहार, पारधी, कुंड, फरीद, बघेला, बिसन, बिसेन, बोपच्या, बोपचे, भगत, भैरव, भैरम, भोयर, ऐड़ा, रंजाहार, रंजहास, रंदीपा, रहमत, राणा, राना, राउत, राहंगडाले, रिमहाईस, शरणागत, सहारत, सहारे, सोनवान्या, सोनवाने, हनवत, हिरणखेड्या, छिरसागर।

लेखक शंकर पवार पत्रकार

पंवारों का मूल गौत्र तो वशिष्ठ ही है ऊपर दिए गए सभी सरनेम या उपनाम है।

उपरोक्त जानकारी प्रकाशन दिनांक तक प्राप्त ग्रामों के नाम तथा सरनेम इस लेख में दिए गए है।

मनमोहन पंवार, मुलतापी समाचार, प्रधान संपादक

Mo. 9753903839

भारत के सबसे उम्रदराज प्रथम श्रेणी क्रिकेटर का निधन


मुलतापी समाचार मनोज कुमार अग्रवाल

मुंबई: भारत के सबसे उम्रदराज प्रथम श्रेणी क्रिकेटर बसंत राय जी का आज शनिवार सुबह निधन हो गया। वह 100 साल के थे। इस साल 26 जनवरी को ही बसंत राय जी ने अपनी जिंदगी का शतक पूरा किया था। तब सचिन तेंदुलकर और स्टीव वा भी उनसे मिलने गए थे।

बसंतराय जी के परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियां हैं। उनके दामाद सुदर्शन नानावटी ने बताया, वह वृद्धावस्था के कारण दक्षिण मुंबई के बालकेश्वर में अपने निवास पर सोते समय 2:20 बजे निधन हो गया।

बसंतराय जी ने 1940 के दशक में नौ प्रथम श्रेणी मैच खेले थे जिसमें 277 रन बनाए थे। उनका उच्चतम स्कोर 68 रन था। जब भारत ने दक्षिण मुंबई के बांबे जिमखाना में पहला टेस्ट मैच खेला था, तब राय जी की उम्र 13 साल की थी।

बसंतराय जी भारतीय क्रिकेट की संपूर्ण यात्रा के गवाह रहे हैं। राय जी ने लाला अमरनाथ, विजय मर्चेंट, सी के नायडू और विजय हजारे के साथ ड्रेसिंग रूम साझा किया है।

मुलतापी समाचार

अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस आज


मुलतापी समाचार मनोज कुमार अग्रवाल

आदमी लेबर डे यानी मजदूर दिवस है! इस दिन को देश और दुनिया में दुनिया में वर्कर डे, कामगार दिवस, अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस, आदि के नाम से भी जाना जाता है! भारत में श्रमिक दिवस की शुरुआत लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान ने 1 मई 1923 को मद्रास में की थी!

अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर देश -प्रदेश की उन्नति में अपना अमूल्य योगदान देने वाले समस्त श्रमिक भाइयों एवं बहनों को बधाई एवं शुभकामनाएं!

मुलतापी परिवार की तरफ से समस्त श्रमिक भाइयों को हार्दिक शुभकामनाएं

माँ खेड़ापति और माँ भवानी मैय्या के दरबार में जले सैकड़ों दीये।


जलाए जलाए जलाए जलाए जलाए

माँ खेड़ापति और माँ भवानी मैय्या के दरबार में जले सैकड़ों दीये।

बैतूल – रोंढा ग्राम की पावन धरा पर माता रानी खेड़ापति (माता मैय्या) और माता रानी भवानी मैय्या का चमत्कारी धाम है। साथ ही रोंढा की पावन धरा पर भगवान भोलेनाथ का विशाल मंदिर, भगवान राधाकृष्ण का सुन्दर मंदिर, साधुबाबा, दैय्यत बाबा, गुरसायब बाबा, दानू बाबा, सिंगला माता, सती मैय्या, सिंगाजी बाबा, झालर वाले देव बाबा, रिझड़ा वाले देव बाबा, पीर बाबा, दुधारी वाले बाबा और तीन दिशाओं में विराजमान हनुमानजी महाराज पूर्णरूप से ग्राम की सुरक्षा किए हुए है।

इस सुरक्षा कवच को तोड़कर आज कोरोना जैसी संक्रामक महामारी गाँव में प्रवेश ना कर सके और आगे आने वाले समय में भी इसका प्रवेश गाँव में ना हो सके। इसके लिए समस्त रोंढा वासियों द्वारा एक – एक दीया माँ खेड़ापति (माता मैय्या) और एक- एक दीया माँ भवानी के पास 28/04/2020 मंगलवार वैशाख शुक्ल पंचमी को शाम छः बजे से शाम सात बजे के बीच प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति मुँह पर मॉस्क लगाकर और सोशल डिस्टेंस को ध्यान में रखते हुए मातारानी के दरबार में जाकर जलाया और मातारानी से हाथ जोड़कर प्रार्थना की।

हे मातारानी हमारे इस गांव का अस्तित्व आपकी छत्रछाया से है और आगे भी इसी प्रकार बना रहे। ऐसी कामना के साथ इस संक्रामक महामारी कोरोना से समस्त रोंढा ग्रामवासियों के प्रत्येक परिवारों, सदस्यों, बुजुर्गों, बच्चों को दूर रखें, और सभी रोंढा ग्रामवासियों को स्वस्थ, खुशहाल और दीर्घायु बनाए रखें।

ऐसे समय में कोरोना से मुक्ति के लिए मात्र एक मिनट के लिये माता मैय्या और भवानी मैय्या के पास अलग-अलग पहुँचकर दीया लगाया ताकि अपने गांव, अपने जिले, अपने प्रदेश, अपने देश के कोरोना वारियर्स को हिम्मत एवं हौसला मिले और कोरोना मुक्ति के लिये केवल एक मिनट की प्रार्थना की हमें माँ खेड़ापति और माँ भवानी पर अटूट विश्वास है मातारानी अपने बच्चों की प्रार्थना को जरूर सुनेगी। अपने परिवार के साथ प्रार्थना से बच्चों को संस्कार के साथ ही एक सकारात्मक ऊर्जा भी मिलेगी।

प्रदीप डिगरसे मुलतापी समाचार बैतूल

जप – तप और यज्ञ से महामारी के प्रकोप से बचता रहा ताप्ती – नर्मदाचंल अवैध रेत कारोबार एवं नदियों की उपेक्षा के चलते कोरोना ने अपने पांव पसारे


Multapi Samachar


इस समय पवित्र पुण्य सलिलाओ एवं आस्था विश्वास के चर्तुभूज खम्बो पर धर्म संस्कृति की प्रताका फहराता भारत उप महाद्धीप का गांव – शहर विदेशी सर जमीन (चीन) से आई कोरोना नामक महामारी के दंश से चिकित्सालय में पड़ा दम तोडऩे लगा है. बड़ी संख्या में अपने – अपने घरों में कैद टोटल लॉक डाउन में जकड़ा भारत का यह हाल कैसे हुआ यह जानना जरूरी है. नदियों के रूप और स्वरूप में तेजी से आए परिवर्तन एवं लोगो का धर्म कर्म काण्ड से विमुख हो जाने से पर्यावरण प्रदुषित हुआ और महामारी ने पांव पसार लिए. मध्यप्रदेश के सीमावर्ती बैतूल जिले एवं होशंगाबाद जिले की सीमा आपस में एक दुसरे से काफी किलोमीटर तक जुड़ी हुई है. जिले की सीमाओं को पश्चिम मुख्यी दो पुण्य सलिला नर्मदा एवं ताप्ती का निर्मल जल मिलता चला आ रहा है. इस समय यदि आकड़ो की बाते करे तो पता चलता है कि इन दोनो जिले में नर्मदा एवं ताप्ती के तेज एवं वेग के चलते महामारी ने अपनी आगोश में उतनी संख्या में लोगो को नहीं निगला जितनी संख्या में अन्य जिलो एवं प्रदेशो की आबादी को वह निगल चुका थी. बैतूल जिले में आकड़ो पर नज़र दौड़ाए तो पता चलता है कि जिले में पहली बार 1864 – 65 में हैजा फैला था. 1877, 1889, 1892,1895,1897, 1900 तक लगातार छै वर्षो तक यह महामारी फैली रही. एक हजार से अधिक मौते हैजा के कारण हुई. हालांकि 1901 से 1905 तक पूरा जिला हैजा मुक्त रहा. 1900 में हुई प्रति हजार पर 12 मौतो का आकड़ा चौकान्ने वाला था क्योकि इस दौर में मौते 3 हजार 608 हुई थी. 1906 में एक बार फिर हैजा फैला जिसमें 166 मौते हुई. वर्ष 1912 में 919 एवं 1916 में 431 मौते हुई. 1929 में सबसे अधिक 2,609 मौते हुई. 1938 में 4767 1945 में 1,081 तथा आजादी के बाद 1953 में 1,212 मौते हुई. पानी के संक्रमण के कारण सर्वाधिक मौतो पर पोटाश परमेग्रेट डाल कर जिले के गांवो एवं शहरो का जलशुद्धि करण कर इस बीमारी पर नियंत्रण पाया गया. हालांकि इस दौरान बड़ी मात्रा में हैजा निरोधक टीके एवं दवाओ का वितरण किया गया. भारत से हैजा से होनी वाली मौते एक प्रकार से रूक गई और आजादी के 70 सालो में इस बीमारी से मौत का प्रतिशत शुन्य रहा.
1904 में फैली प्लेग की 1942 में बिदाई
चेचक ने पांव पसारे
इसे अपवाद कहे या कुछ और ही जिसके अनुसार भारत में 1896 में महामारी बने प्लेग की एक वर्ष बाद 1897 प्लेग का टीका बन चुका था. इस महामारी ने अखण्ड भारत के केन्द्र बिन्दू बेतूल में 1904 में दस्तक दी. अग्रेंजो द्वारा 1823 को बनाए गए बेतूल वर्तमान जिला मुख्यालय (बदनूर) में 1904 में प्लेग से 35 मौते हुई. इस वर्ष ही प्लेग ने बैतूल नगर से गांवो की ओर पांव पसारे. वर्ष 1908 में जिले में प्लेग पूरी तरह से फैल चुका था. इस वर्ष 534 मौते हुई. इसके बाद लगातार 2 वर्षो 1911 में 104 तथा 1912 में 308 मौते हुई. वर्ष 1913 में प्लेग अधिकारी एवं कर्मचारी की नियुक्ति के साथ पूरे जिले में इस महामारी से लडऩे का मास्टर प्लान तैयार किया गया. जिसके चलते 4 वर्षो तक न तो प्लेग फैल सका और न उससे किसी प्रकार की मौते हुई लेकिन1917, 1918,1919 में एक बार फिर प्लेग ने पंाव पसार लिए जिसके चलते बड़ी संख्या में लोगो की मौते हुई.1920 में 227 लोगो की मौत ने पूरे जिले को चौका डाला.1942 को बैतूल जिले से पूरी तरह से बिदा हो चुकी प्लेग ने 1928 में 742 तथा 1929 में 556 लोगो को अपने काल के गाल में जकड़ लिया.
बैतूल जिले में चेचक जैसी महामारी की 1977 में भारत से बिदाई
गुलाम एवं आजाद भारत के 59 सालो में 2 हजार से अधिक मौते
मध्यप्रांत के गठन के बाद 1896 से लेकर 1955 के बीच बैतूल जिले में चेचक (शीतला, बड़ी माता, स्मालपोक्स) से मरने वालो की संख्या 2,324 थी. चेचक एक विषाणु जनित रोग है. श्वासशोथ एक संक्रामक बीमारी थी, जो दो वायरस प्रकारों (व्हेरोला प्रमुख और व्हेरोला नाबालिग) के कारण होती है. इस रोग को लैटिन नाम व्हेरोला या व्हेरोला वेरा द्वारा भी जाना जाता है. बैतूल जिले से ही नहीं पूरें देश से 26 अक्टूबर 1977 को चेचक बड़ी माता की बिदाई हो गई. एक तथ्य यह भी है कि वर्ष 1796 में चेचक (बड़ी माता ) महामारी के रूप में सामने आई इस बीमारी का 1798 में एडवर्ड जेनर द्वारा चेचक के टीके की खोज की गई. 19वीं सदी के दौरान भारत में वायरस जनित रोगों से निपटने के कदम तेज हुए. इसके तहत वैक्सीनेशन को बढ़ावा दिया गया, कुछ वैक्सीन संस्थान खोले गए. कॉलरा वैक्सीन का परीक्षण हुआ और प्लेग के टीके की खोज हुई. बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में चेचक के टीके को विस्तार देने, भारतीय सैन्य बलों में टायफाइड के टीके का परीक्षण और देश के कमोबेश सभी राज्यों में वैक्सीन संस्थान खोलने की चुनौती रही. आजादी के बाद बीसीजी वैक्सीन लैबोरेटरी के साथ अन्य राष्ट्रीय संस्थान स्थापित किए गए. 1977 में देश चेचक मुक्त हुआ. टीकाकरण का विस्तारित कार्यक्रम (ईपीआइ) का श्रीगणेश 1978 में हुआ.सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम 1985 में शुरू हुआ था. बैतूल जिले में 1956 से लेकर 1964 तक 9 वर्षो के प्रथम चरण में 2 लाख 1 हजार 414 लोगो को चेचक का टीका लगाया गया. द्धितीय चरण में इन 9 वर्षो में चेचक बड़ी माता के टीकाकरण के अभियान के तहत 6 लाख 33 हजार 673 लोगो को टीका लगवाया गया.
महामारी की रोकथाम के लिए
पंचामृत से बांधे गए गए गांव
बैतूल जिले के अधिकांश गांवो में चेचक,हैजा, प्लेग की महामारी के लिए ग्रामिणो द्वारा गांवो को पंचामृत से बांधा गया. बैतूल जिला मुख्यालय से लगे ग्राम रोंढ़ा के सेवानिवृत वनपाल श्री दयाराम पंवार के अनुसार गांव को दुध – दही – शहद – घी – गौमूत्र के मिश्रण की एक बहती धारा के साथ गांव की चर्तुभूज सीमाओ को बांधा गया. ग्रामिणो का विश्वास और आस्था ने अपना असर दिखाया और गांव पूरी तरह से महामारी के प्रकोप से मुक्त हो गया.
2012 में पूरी तरह से पोलियो मुक्त हुआ
मध्यप्रदेश का आदिवासी बैतूल जिला
महामारी के आते – जाते प्रभावो से बैतूल जिला पूरी तरह से प्र्रभावित रहा. जिले में यूं तो मलेरिया, क्षय रोग विषाक्त वायरस के चलते दस्तक दे चुके है. जिले ने वर्ष 2012 में पोलियो से जिले को मुक्ति मिल गई. बैतूल जिले में इस वर्ष मार्च में कोरोना जैसी महामारी की दस्तक ने सभी को चौका दिया. 21 दिन के लॉक डाउन के बाद जिला पूरी तरह से घर में कैद हो गया जिसके कारण जिले में मात्र एक व्यक्ति ही इस बीमारी से संक्रमित पाया गया. जिले में कोरोना की दस्तक ने एक बार फिर सवाल उठाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.
कोरोना की बीमारी का कारण क्या !
जल – थल – वायु सभी पूरी तरह से प्रदुषित
बैतूल जिले में कोरोना की दस्तक का कारण भले ही तबलीगी जमात से जुड़े लोग रहे हो लेकिन सवाल यह उठता है कि जिले में इस महामारी संक्रामण फैला कैसे और क्यों ! अकसर कहा जाता है कि बीमारी को फैलाने में हवा और पानी का सबसे अधिक जवाबदेह होते है. जिले के गांव – गांव तक इस बीमारी के फैलने के प्रमुख कारणो पर यदि गौर किया जाए तो पता चलता है कि बीते 3 दशको में ताप्ती एवं नर्मदाचंल में वायु प्रदुषण बढऩे से यहां का पर्यावरण प्रदुषित है. बैतूल – होशंगाबाद जिले की दो प्रमुख नदियों सहित जिले की नदियो एवं नालो में बड़े पैमाने पर रेत के लिए अवैध उत्खनन ने जिले की नदियो से लेकर नालो तक को प्रदुषित किया है. बैतूल या होशंगाबाद जिले में बड़े पैमाने पर नदियों से ही जल आपूर्ति की जाती है. ऐसे में कोरोना के वायरस का गांव – गांव तक या घर – घर तक प्रवेश का एक माध्यम प्रदुषित जलआपूर्ति भी हो सकती है. इस समय जानकार लोग इन जिलो में संक्रामक बीमारो से अन्य प्रदेश एवं जिलो में होने वाली मौतो के अनुपात में कम मौतो के लिए जिले की पवित्र पुण्य सलिलाओ को मानते है. भले ही बीते एक दशक में नदियों के किनारे धार्मिक आयोजन यज्ञ एवं अन्य धार्मिक कार्यक्रम जिसमें बड़े पैमाने पर डाली जाने वाली आहूति से वायु प्रदुषण की रोकथाम होती है. शुद्ध हवा के लिए यज्ञ संस्कार जरूरी है
ताप्ती – पूर्णा – नर्मदा की उपेक्षा ने
कोरोना जैसी महामारी को दिया संरक्षण
बैतूल जिले मे एक मात्र संक्रामक रोगी भैसदेही का व्यक्ति मिला. भैसदेही पुण्य सलिला चन्द्रपुत्री पूर्णा का जन्म स्थान है. आज प्रदेश की नदियों की तरह पूर्णा भी उपेक्षित एवं प्रदुषित है. पूर्णा घाटी को लेकर बना गए पूर्णा पुर्न:जीवन प्रकल्प के दम तोडऩे के बाद नर्मदा एवं ताप्ती को प्रदुषण मुक्त करने की कोई ठोस नीति या रीति सामने नहीं आई. नदियो की उपेक्षा एवं उनके किनारो के रख रखाव तथा घाटो के बड़े पैमाने पर निमार्ण न होने के कारण नदियों ने अपना स्वरूप विकृत कर लिया. बीते एक दशक से नदियों के किनारे धार्मिक यज्ञ संस्कार कम अवैध रेत का कारोबार फल – फूल रहा है. जिसके कारण इन दोनो जिले की हवा और पानी दोनो ही प्रदुषण की मार के शिकार हो चुके है. जमीनी प्रदुषण का प्रमुख कारण गगन चुम्बती इमारतो एवं अवैध अतिक्रमण के साथ जिले में बड़े पैमाने पर नगरीय निकायो एवं ग्राम पंचायतो द्वारा बनवाए गए कचरा घरो से है जो हजारो टन कचरा एकत्र कर जिले में ऐसे स्थानो की संख्या में बढ़ोतरी लाए हुए जिन्हे सरकारी भाषा में प्रेचिंग गाऊण्ड कहा जाता है जहां पर पूरे शहर का पन्नी प्लास्टीक सड़ता या फिर जलता हुआ प्रदुषण का जनक बना हुआ है. आज जरूरत है कि महामारी से बचने के लिए हम बड़े पैमाने पर अपने जल – थल – नभ को प्रदुषण मुक्त रखे ताकि इन तीनो के माध्यम से कोई जानलेवा महामारी अपने पांव पसार न सके.
इति

मुलतापी समाचार – रामकिशोर दयाराम पंवार

आंसू बहाती गई, इतिहास रचता गया….


आत्‍मकथा

मैं अकेली थी और वे चार थे

आंसू बहाती गई इतिहास रचिता गया इस लंबे सफ़र में 2651 दिन घुट घुट के आंसू बहाती गई इतिहास रचता गया मैंने ठान रखा था

मैं टूटूगींं तो इन चारों हत्यारों को लेकर टूटूगींं निर्भया की सिसकती आहें मुझे सोने नहीं देती थी

मेरी तो अंतिम इच्छा ही यह थी मैं तो इन चारों हत्यारों को लेकर ही टूटूगींं आगे पढि़ए

आंसू बहाती गई इतिहास रचा गया

मैं अपने पुराने दिनों को याद करती हैं, तो आश्चर्य होता है कि जब में बिना पिये दो-चार कदम भी नहीं चल पाती थी. अब तो मैं समय के साथ-साथ इतनी बदल गई है, जैसे रेगिस्तान में ऊँट एक-एक माह का पानी एक साथ पीकर लगातार चलता जाता है।

वैसे में अपनी व्यथा क्या सनाऊँ मैं तो वो मनचली हूँ, जिसने मुझे थामा बस उसकी ही उंगलियों थामें उसके भविष्य को संवारने में लग जाती हूँ। मेरे लिये न तो कोई उम्र की सीमा है. ना जाति का बंधना मुझे न तो कोई अमीर से लगाव है और न गरीब से परहेज, मैं तो स्वच्छन्द विचारों वालों के हाथों की कठपुतली हूँ, जो उसकी खुशी, गम, जज़बात, भावना और विचारों के अनुसार नाचती, आँसू बहाती जाती हूँ और इतिहास रचती जाती हूँ।

अक्सर मुझे लोग अपने दिल से लगाकर रखते हैं, हर कोई अपने दिल-दिमाग को संतुलित कर मुझे अपने हाथों में थामे अपनी कहानी, व्यथा सुनाता जाता है और मैं उसकी उंगलियाँ थामे आँसू बहाती चलती जाती हूँ। मैं तो वह दिवानी हूँ, जिसकी पनाह में जाती हूँ, उसका ही अस्तित्व बनकर रह जाती हूँ। ऋषि-मुनियों के हाथों लगी तो वेद और शास्त्र बन गये। न्याय के पुजारी ने छुआ तो न्याय का इतिहास रचती चली गई। कमजोर गरीब असहाय की तो अर्जी बन न्याय का दरवाजा खट-खटाती चली आ रही हूँ। किसी कलाकार की इच्छा अनुसार उसकी कलाकृति, किसी शायर की मनचाही शायरी और किसी कवि की भावनात्मक कविता, कल्पना और साहित्यकार की रचना रचकर लोगों का दिल जीत रही हूँ। मजे की बात तो यह है कि मैं तो राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री, नेता, राजनेता, आई.ए.एस., आई.पी.एस. की वो ताकत हूँ, जिस रास्ते चली गई, गानों पत्थर की लकीर, तब तो लोग मुझे पूजते हैं, सम्मान देते हैं। नन्हें-मुन्ने बच्चे बड़े ही लगाव से अपनी नाजुक, नन्हीं-नन्हीं कोमल उंगलियों में थामे मुझे चलाने का प्रयास करते हैं और मैं उनका भविष्य संवारने में पूरा-पूरा सहयोग देती हूँ। गाँवों में कुछ महिला, बड़े-बूढ़े जब कभी पहली-पहली बार शर्माते हुए अपने हाथों में मुझे लेते हैं, तो उनके हाथ कांपने लगते हैं. तब मुझे बड़ा ही अजीब अहसास होता है। मुझे थामने वालों को, सभी को अपना सम्राट मानती हूँ और उसके इशारों पे नाचती हूँ, पर जब मैं लोगों को मेरे इशारे पर नाचता देखती हूँ तो मुझे बेहद खुशी के साथ-साथ पूर्ण तृप्ति मिलती है और मुझे अपनी अहमियत का पता चलता है। मेरी तो सदा उनके प्रति आस्था (श्रद्धा) रहती है, जो मुझे सही राह पर चलाते हैं।

मुझे अपने आप पर फक्र है, मैं टूटती भी हूँ तो पहले किसी हत्यारे के नाम मौत का पैगाम (Hanging till Death ) “हैगिंग टिल डैथ” लिख मेरे न्यायप्रिय सम्राट के हाथों मेरा रार-कलग कर दिया जाता है। वॉह रे मेरी किस्मत, मैं कोई और नहीं आपके हाथों की ही एक कलम हूँ।

कलमकार लेखक-श्रीवास अशोक (सम्राट), बैतूल

Mr Ashok Shrivash, Betul

पूरें देश में 21 दिनों तक लॉक डाउन घबराएं नहीं, इन जरूरी सामानों की दुकानें चालू रहेंगी, यहां देखें पूरी लिस्‍ट


PM मोदी जी का खास संदेश कोराना – कोई रोड पर ना निकले

21 Days Lockdown : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए आज एक बड़ा ऐलान करते हुए 21 दिनों तक के संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर दी है। इसे सुनकर कई शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। किराना, सब्‍जी, दूध, दवा, पेट्रोल लेने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी है। लेकिन सरकार ने स्‍पष्‍ट किया है कि जरूरी सामान इन 21 दिनों में बाजार में उपलब्‍ध रहेंगे। किसी भी प्रकार से घबराने की जरूरत नहीं है। यहां हम आपको बता रहे हैं सरकार की गाइडलाइन। जानिये कितने तरह की जरूरी दुकानें, सेवाएं चालू रहेंगी। देखें पूरी लिस्‍ट।

इन सेवाओं पर रोक नहीं

सरकार की ओर से जारी गाइडलाइन के मुताबिक, स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं पर रोक नहीं रहेगी और दवा की दुकानें यानी मेडिकल स्‍टोर, मेडिकल इक्विपमेंट की दुकानें, पैथ लैब और राशन की दुकानें खुली रहेंगी… यानी अस्पताल, डिस्पेंसरी, क्लीनिक, नर्सिंग होम खुले रहेंगे। यही नहीं लोगों को डॉक्टर के यहां जाने और अस्‍पताल से घर आने की छूट होगी। पेट्रोल, सीएनजी, एलपीजी, पीएनजी जैसी जरूरी सेवाओं पर भी रोक नहीं लगेगी।

खुले रहेंगे पेट्रोल पंप

केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी एडवाइजरी में कहा गया है कि पेट्रोल, सीएनजी, एलपीजी, पीएनजी CNG, LPG, PNG जैसी जरूरी सेवाओं पर भी रोक नहीं लगेगी। यही नहीं बिजली उत्‍पादन, बिजली वितरण भी निर्बाध जारी रहेगा और विद्युत विभाग में काम करने वाले कर्मचारियों को भी काम पर जाने की इजाजत होगी। यही नहीं प्राइवेट सिक्‍योरिटी सेवाएं भी जारी रहेंगी।

इनका उत्‍पादन नहीं होगा बंद

सरकार की ओर से जारी एडवाइजरी में कहा गया है कि सभी उद्योग और कल कारखाने बंद रहेंगे। हालांकि, जरूरी सामानों का उत्‍पादन करने वाली इकाइयों को अपवाद के दायरे में रखा गया है। उत्‍पादन इकाइयों को भी अपवाद की श्रेणी में रखा गया है लेकिन इसके लिए राज्‍य सरकार से इजाजत लेनी होगी।

Lockdown लॉकडाउन पर ये हैं सरकार के निर्देश

मंत्रालयों, सरकारी विभागों, राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के लिए निर्देश

1.भारत सरकार के सभी कार्यालय, स्वायत्त एवं अनुषंगी इकाइयां और सरकारी कंपनियां बंद रहेंगी।

इन्हें रहेगी छूट : रक्षा, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, राजस्व, सीएनजी, पीएनजी, एलपीजी, पेट्रोलियम जैसी जन सुविधाएं, आपदा प्रबंधन, ऊर्जा, डाकघर, राष्ट्रीय सूचना केंद्र, चेतावनी एजेंसियां

2.राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों के कार्यालय, स्वायत्त एवं अनुषंगी इकाइयां, कंपनियां बंद रहेंगी।

इन्हें रहेगी छूट : क – पुलिस, होमगार्ड, अग्निशमन एवं आपात सेवाएं, आपदा प्रबंधन एवं जेल ख – जिला प्रशासन एवं राजस्व ग – बिजली, पानी एवं सफाई घ – नगर निकाय – केवल स्वच्छता एवं जलापूर्ति आदि से संबंधित अनिवार्य कर्मचारी उपरोक्त दोनों श्रेणियों में बताए गए कार्यालय न्यूनतम कर्मचारियों के साथ काम करेंगे। अन्य सभी कार्यालय केवल वर्क फ्रॉम होम कराएंगे।

3. अस्पताल एवं संबंधित चिकित्सा इकाइयां, उनके विनिर्माण एवं वितरण से जुड़ी इकाइयां, केमिस्ट, डिस्पेंसरी, नर्सिंग होम, एंबुलेंस एवं इनके आवागमन आदि कायोर् में जरूरी परिवहन चलते रहेंगे। इनके सहयोग के लिए जरूरी पैरा मेडिकल स्टाफ व अन्य को भी अनुमति रहेगी।

4. वाणिज्यिक एवं निजी कंपनियां बंद रहेंगी।

इन्हें रहेगी छूट : क-दुकानें, पीडीएस के तहत चलने वाली राशन दुकानें, खाने-पीने, दूध, रसोई के सामान आदि से संबंधित दुकानें। हालांकि, लोगों को घरों से कम से कम निकलना पड़े, इसके लिए जिला प्रशासन होम डिलीवरी को बढ़ावा देगा। ख -बैंक, इंश्योरेंस ऑफिस, एटीएम ग -प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया घ -दूरसंचार, इंटरनेट, ब्रॉडकास्ट एवं केबल सर्विस। आवश्यक सेवाओं से जुड़ी आइटी इकाइयां, हालांकि यथासंभव वर्क फ्रॉम होम।

5. ई-कॉमर्स के जरिये खाद्य पदार्थ, दवा, मेडिकल उपकरण समेत आवश्यक वस्तुओं की होम डिलीवरी

UPDATE: All essential services to continue and remain functional. List of essential services remains unchanged since the March 22nd ‘Janta Curfew’ #Coronavirus https://twitter.com/ANI/status/1242465644169199625 …ANI@ANIWe are taking all steps to ensure continuous supply of essential commodities: PM Narendra Modi3,431Twitter Ads की जानकारी और गोपनीयता1,482 लोग इस बारे में बात कर रहे हैंANI@ANI

Ministry of Home Affairs guidelines for offences and penalties during the 21-day countrywide lockdown. #CoronavirusLockdown

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My fellow citizens, THERE IS ABSOLUTELY NO NEED TO PANIC. Essential commodities, medicines etc would be available. Centre & various state governments will work in close coordination to ensure this. Together, we will fight #COVID19 and create a healthier India. Jai Hind!: PM Modi

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Ministry of Home Affairs will shortly issue guidelines of effective measures and exceptions to the essential services during this 21-day lockdown. There will shortly be an MHA 24/7 hotline to assist states during this period. #CoronavirusLockdown

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Tamil Nadu: People throng a market to purchase vegetables in Coimbatore where restrictions under section 144 of CrPC are in place to contain the spread of #CoronavirusPandemic.

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शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने की विधि-विधान क्या है?


मुलतापी समाचार

सनातन धर्मियों नीति

शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने की विधि-विधान क्या है?

सावन का महीना आते ही श्रद्धालु महादेव शंकर को प्रसन्न करने का कोशिश में जुट जाते हैं, शिवलिंग पर गंगाजल और साथ साथ बेलपत्र भी चढ़ाने का विधान है।

फुल तोड़ने के नियम

चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथि को संक्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र न तोड़ें।

बेलपत्र भगवान शंकर को बहुत प्रिय है, इस लिए इन तिथियों या वार से पहले तोड़ा गया पत्र चढ़ाना चाहिए।

शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके तो किसी दूसरे के चढ़ाएं हुए बेलपत्र को भी धोकर कोई वार इस्तेमाल किया जा सकता।

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यादि पुनः पुनः शंकरायार्पणीयानि न नवानि यादि क्वचित।।

टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पुरी टहनी नहीं तोड़ना चाहिए पत्र इतनी सावधानी से तोड़ना चाहिए कि वृक्ष का कोई नुक्सान ना पहुंचे।

बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्षों को मन ही मन प्रणाम कर लेना चाहिए।

बेलपत्र कैसे चढ़ने चाहिए

महादेव को बेलपत्र हमेशा उल्टा उर्पित करना चाहिए यानी पत्र का चिकना भाग शिवलिंग के उपर रहना चाहिए।

बेलपत्र में चक्र और वज्र नहीं होना चाहिए।

बेलपत्र 3 से लेकर 11 दलों तक के होते हैं, ये जितने अधिक पत्र हो उतने ही उत्तम मानी जाता है।

अगर बेलपत्र उपलब्ध न हो तो बेल के वृक्ष के दर्शन ही कर लेना चाहिए। उससे भी पाप ताप नष्ट हो जाता है।

शिवलिंग पर दुसरे के चढ़ाएं बेलपत्र की उपेक्षा या अनादर नहीं करना चाहिए।

सुभाष चंद्र बाला

रानी पद्मावती और चित्तौड़गढ़ का इतिहास


ईसवी सन 1303 में रानी पद्मावती ना मिल पाने व उसकी मृत्यु से अलाउद्दीन खिलजी पागल सा हो गया था। वह अपने को छला हुआ महसूस करने लगा था। पूरे 8 माह युद्ध के बाद भी वह पद्मावती को ना पा सका। किंतु अब चितौड़ उसके अधीन था।

रानीपद्मावती की जौहर अग्नि ।
खिलजी को कर गयी छलनी ।।

इसके पश्चात मध्य व दक्षिण भारत में विजय के लिए उसने अपने सेनापति मुल्तानी को भेजा। सन 1305 ईसवी में मालवा पर अधिकार करने के लिए खिलजी की सेना आगे बढ़ी। उस समय मालवा पर पंवार राजा महलक देव का राज था। जैसे ही खबर मिली कि खिलजी की विशाल सेना मालवा पर अधिकार करने आ रही है, राजा महलक देव ने तुरंत सेना तैयार की और युद्ध के लिए रवाना हो गए। उन्होंने खिलजी की सेना को रतलाम के पास ही रोक लिया। दोनो सेनाओं में युद्ध होने लगा। राजा महलक देव के नेतृत्व में पंवार सैनिक कुशलता से लड़ रहे थे। पंवारो से युद्ध मे खिलजी की सेना के होश उड़ गए। उस युद्ध मे अब तक 700 मुस्लिम सैनिक मारे जा चुके थे तो वही पंवारो के 500 सैनिक। खिलजी के सेनापति ने अपने सैनिको को हिम्मत हारते देख तुरंत सैनिक सहायता की मांग की खिलजी ने तुरंत सैनिक भेज दिये और साथ ही अच्छे हथियार भी पहुचाये गये।और सैनिक टुकड़ी आते देख पंवार सैनिकों में अफरा तफरी मच गई। राजा महलक देव ने सैनिकों को पीछे हटने का आदेश दिया। क्योंकि ख़िलजी के सैनिक संख्या में ज्यादा थे साथ ही उनके पास अन्य सैनिको द्वारा अच्छे हथियार लायें गये थे। बचे हुए सैनिक और राजा महलक देव पीछे लौटते हुये मांडू आ गये। उस युद्ध मे मरे हुये सैनिको के साथ 12 बाई सती हो गई थी।राजा महलक देव के पीछे हटने के बाद भी खिलजी की सेना ने उनका पीछा किया और मांडू तक आ गये। वहाँ भी युद्ध होने लगा। सेनापति मुल्तानी ने राजा महलक देव को मार दिया। राजा महलक देव की मृत्यु से पंवार सैनिकों में अफरा तफरी मच गई। मांडू को घेर लिया गया। सभी पवाँर सैनिक वहाँ से भागने लगे। इस हार से पंवारो ने अपनी आन बान और संस्कृति बचाये रखने के लिए मालवा क्षेत्र से पलायन का विचार किया। कुछ पंवार धार के आस पास के गांव में बस गए। पंवारो ने राजा महलक देव के पुत्र संजीव कुमार को धारा नगरी का नया राजा घोषित किया गया। ( इतिहास में वर्णित आधार पर)

रतलाम युद्ध मे हार के बाद पवाँर सैनिक अपने साथ जरूरत के सामान ले अपने-अपने परिजनों के साथ वहाँ से पलायन कर नर्बदा किनारे वर्तमान पवारखेड़ा( होशंगाबाद) तक आये और वहाँ से नर्बदा जी को पार कर पहला पड़ाव डाला। जिसमें 72 कुल के लोगो ने पलायन किया था।। युद्ध से थके हारे सैनिक और उचित खान पान की व्यवस्था ना हो पाने के कारण बच्चे, बूढे और महिलाएं बीमार होने लगीं। तभी कुछ बुजुर्गों ने इस बीमारी को देवी का प्रकोप समझ पूजा भंडारा की सलाह दी। सभी पंवारो ने मिल कर चंदा जमा किया जिससे 1200 रुपये जमा हुए। इन पैसों से विशाल भंडारा व देवी पूजा की गई। जिसमें आस पास के बहुत से लोग शामिल हुए थे।(भाट से मिली जानकारी पर) पंवारो ने जहाँ पहला पड़ाव डाला था वह स्थान पवारखेड़ा नाम से जाना जाने लगा। अपने मूल स्थान से नये वातावरण में भटके शाकाहारी धार्मिक पवाँर जाती दिनों दिन दुर्बल होती जा रही थी। उन्होंने वहाँ से सतपुडा के जंगलों में आगे बढ़ते हुए दूसरा पड़ाव वर्तमान धार गांव में डाला। कहाँ वह राजसी ठाठ बाट और कहाँ यह वनवासी जीवन पवाँर जाति की हालत में अब भी कोई ज्यादा सुधार नही हुआ था। रतलाम युद्ध मे घायल कुछ लोग मर चुके थे जिसके कारण स्थति दयनीय थी। जंगलों में रहने वाले गोंड जाति के लोग दुबले पतले पंवार को देख उन पर हँसते औऱ मांस मदिरा सेवन की बात बताते। उस समय गोंड जाति जंगलों में शिकार व महुआ की दारू का सेवन करती थी। जंगल के वातावरण में यह भोजन उनके अनुकूल भी था। इन जंगलों में शाकाहारी जीवन शरीर के लिए अनुकूल ना होने के कारण कुछ बुजुर्गों ने मांस व मदिरा का भक्षण उचित समझा।

उस समय वहाँ के गोंड राजा नरसिंह राय प्रथम थे। उन्हें खबर मिली कि कुछ राजपूत सैनिक युद्ध में हारकर उनके राज्य में आये हैं तो वे उनसे मिलने आये उनकी दुर्बलता को देख उन्होंने भी मांस खाने की सलाह दी। पवाँर लोगो ने धार गांव के समीप ही जनेऊ को निकाल कमर में बांध लिया तो कुछ लोग जनेऊ को नर्मदा जी मे प्रवाहित कर आये।राजा नरसिंह राय राजपूत लोगो की शक्ति से भली भांति परिचित थे। उन्होंने पंवारो को अपनी राजधानी बुलाया और सभी की अच्छी आवभगत करी। और वही बस जाने को कहाँ। वह क्षेत्र बदनूर (वर्तमान बैतूल ) के पास था। गोंड राजा ने उन्हें महाजन करके संबोधित किया और गाँव बसाने के लिए जमीन दान दी। वर्तमान में बैतूल के पास रोंढा , भडूच, बैतूल बाजार , खेड़ी, गाँव मे आज भी पवाँर अपने महाजनी ठाठ बाट से रहते हैं। और अपने को महाजन बताते हैं। गोंड राजा से मित्रता के बाद पंवारो ने उनकी मदद का आश्वासन दिया। खेड़ला किला का निर्माण राजा नरसिंह राय ने 14 वी सदी में किया था। जिसमे पवाँर जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्तमान में यह किला खंडहर का रूप के चुका है। यहाँ खजाने की खोज में कई बार खुदाई की गई है। खुदाई से पता चला है कि वहाँ सूर्य मंदिर भी था। सूर्य मंदिर पंवारो के अग्नि उपासक होने के प्रमाण है। भले ही राज्य छूट गया पंरतु वे अपनी सांकृतिक विरासत को कभी नही भूले। अपनी बोली, पहनावा, रीति रिवाज नही भूले ।

बैतूल से आगे बढ़ते हुये पवाँर समाज ताप्ती उदगम मुलताई तक पहुँच गये। वहाँ उन्होंने कई गांव बसाए जैसे चन्दोरा, खैरवानी, ढोब सिलादेही , जोलखेड़ा आदि। तो कुछ लोग देवगढ़ की ओर आगे बढ़े तो कुछ परतवाड़ा, वर्धा नदी के किनारे जा बसे। ( पूरी जानकारी मिलने पर आगे लिखुंगा)
धन्यवाद
मनोज देशमुख
जानकारी स्त्रोत- राजेश जी बारंगे
इतिहास की किताबें

मुलतापी समाचार द्वारा प्रस्‍तुत