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बायो फ्यूल से जल्‍द दौडेंगे वाहन


रतनजोत से बायो फ्यूल के लिए सहायक

रतनजोत से बायो फ्यूल का उत्पादन कर राज्य को प्रदूषित मुक्त करना राज्य सरकार के लिए दूर की कौड़ी साबित हो रहा है।

राजस्‍थान में वाहनों का बायो डीजल हुआ सरकार के लिए दूर की कौड़ी

Multapi Samachar

रतनजोत से बायो फ्यूल का उत्पादन कर राज्य को प्रदूषित मुक्त करना राज्य सरकार के लिए दूर की कौड़ी साबित हो रहा है। सरकार ने रतनजोत की खेती को प्रोत्साहन देने के कई प्रयास किए, लेकिन इसकी खरीद दर कम होने के कारण किसानों में इसके प्रति रुझान कम है। एेसे में सरकार के पास ज्यादा से ज्यादा पौधों को लगाकर उत्पादन कर फ्यूल प्राप्त करना ही उपाय रहा गया है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने बायो फ्यूल को प्रोत्साहन देकर वर्ष 2022 तक डीजल की खपत 10 फीसदी कम करने का लक्ष्य रखा है।

सरकार की समितियों ने रतनजोत की खरीद दर 12 रुपए प्रति किलोग्राम निर्धारित की है, वहीं राजस संघ इसे 15 रुपए व मंडी समितियां 18 रुपए प्रति किग्रा की दर से खरीद रही है। एेसे में सरकार की मुश्किल यह है कि रतनजोत का ज्यादा मात्रा में कैसे संग्रहण किया जाए, क्योंकि काफी कम संख्या में इसकी खेती कर रहे किसान भी अच्छे दाम पाने के लिए कृषि उपज मंडियों का रुख कर रहे हैं।

अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने इस बारे में केन्द्र सरकार से बात की गई थी, तो सरकार का कहना है कि किसानों को बाध्य नहीं कर सकते, वे जहां चाहे उत्पाद को बेच सकते हैं। एेसे में सरकार के पास एक ही विकल्प है कि इसके अधिक-अधिक पौधे को लगाकर उत्पादन करें। सरकार ने अभी तक इसको अनुपयोगी भूमि पर ही लगाया है, कृषि भूमि पर इसकी खेती पर कोई चर्चा नहीं हुई।

अधिकारियों के अनुसार सरकार इसकी खरीद मूल्य को भी बढऩे में सक्षम नहीं है। वर्तमान में इसका खरीद मूल्य 12 रुपए प्रति किग्रा है, जिसे 15 रुपए प्रति किग्रा तक खरीद सकते हैं। एेसे में प्लांट में फ्यूल बनाने के लिए मशीन, मजदूर, बिजली आदि खर्चों के बाद एक लीटर बायो फ्यूल की सरकारी लागत करीब 38 रुपए एवं निजी कम्पनी की लागत 40 रुपए आती है जिसे 44 रुपए प्रति लीटर में बेचा जाता है। अगर इसका खरीद मूल्य कृषि उपज मंडी के बराबर किया जाता है लागत बढ़ जाएगी। एेसे में कम मूल्य पर बायो फ्यूल प्राप्त करना आसान नहीं होगा। जानकारों को कहना है कि उदयपुर संभाग में भारी मात्रा में रतनजोत का उत्पादन होता है, जिसमें से मात्र 10-15 प्रतिशत ही उपयोग हो पा रहा है। सरकार इस ओर ध्यान दे तो बायो फ्यूल उत्पादन बढ़ सकेगा। हालांकि राजस संघ के अधिकारियों का कहना है कि मात्र 10 प्रतिशत की रतनजोत बच पाती है बाकि उपयोग में आ रही है।

अब होगी नीलामी शुरू

एकमात्र वन उपज मंडी उदयपुर में कुछ मात्रा में ही नीलामी हो पाती है। जल्द ही ढंग से नीलामी शुरू होगी, जिससे रतनजोत का भाव बढ़ेगा। इससे किसान और उत्पाद मंडी की ओर आकर्षित होंगे, मगर यह स्थिति भी सरकारी स्तर पर बायो फ्यूल उत्पादन की मुश्किलें बढ़ाएगी।

कृषि उपज मंडी

व न उपज मंडी के बनने के 18 माह में 17-20 रुपए किलो ग्राम के अनुसार कृषि उपज मंडी ने 1 करोड़ 70 लाख रुपए की 10731 क्विंटल रतनजोत की खरीद-फरोख्त हुई जिससे 2 लाख 71 हजार रुपए की मंडी शुल्क प्राप्त की। सर्वाधिक आवक अक्टूबर व दिसम्बर में होती है।

12 जिलों से प्राप्त किया रतनजोत (मेट्रिक टन में)

2011-12 90.709

2012-13 103.390

2013-14 1100

2014-15 2144.73

2015-16 1005

राजस संघ उदयपुर ने इतना प्राप्त किया

2009-10 7889.32 12 रुपए किग्रा

2010-11 738 9.30 रुपए किग्रा

2011-12 907 12 रुपए किग्रा

2012-13 83 15 रुपए किग्रा

(क्विंटल में)

राजस संघ के दायरे में

कोटड़ा, झाड़ोल, सलूम्बर, सिरोही (आबू रोड), गोगुंदा, कुम्भलगढ़, पीपलखूंट, घाटोल, घंटाली, रवागुड़ा, कुशलगढ़, प्रतापगढ़ आदि।

जिले में काफी मात्रा में रतनजोत का उत्पादन हो रहा है। मंडी ने भी कई गुना ज्यादा रतनजोत की खरीदी की है। आने वाले समय में पूर्णत: नीलामी प्रक्रिया होने के बाद किसानों को अच्छा भाव मिल पाएंगा।

भगवान सहाय जाटवा, सचिव, कृषि उपज मंडी, उदयपुर

बाजार मूल्य को ध्यान में रखकर ही समिति की ओर से मूल्य का निर्धारण किया जाता है। इसे फ्यूल के अलावा दूसरे उपयोग में भी लिया जाता है। इसका व्यापार करने के लिए किसानों को बाध्य नहीं कर सकते।

सुरेन्द्रसिंह राठौड़, बायोफ्यूल प्राधिकरण।

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