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भ्रष्टाचार पर CM गहलोत हुए सख्त, अब सभी कर्मचारियों को देना होगा संपत्ति का ब्यौरा


मुलतापी समाचार

राजस्थान में भ्रष्टाचार के बढ़ते मामले और कर्मचारियों के रिश्वत लेने की लगातार मिलती शिकायतों के बाद सरकार अब सख्ती बरतने के मूड में है. सरकार सभी कर्मचारियों के लिए अब चल-अचल संपत्ति की जानकारी देना अनिवार्य करने जा रही है. इसकी जानकारी एंटी करप्शन ब्यूरो के अधिकारियों को भी दी जाएगी. अभी तक सिर्फ अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों और राजपत्रित अधिकारियों को ही अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा देना होता था.

दरअसल मुख्यमंत्री अशोक गहलोत शासन में पारदर्शिता चाहते हैं. उनका प्रयास है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे और काम के बदले लिए जाने वाले पैसों पर रोक लगे. इसके लिए उन्होंने अब नया सिस्टम तैयार किया है. जिसके अनुसार बाबू से लेकर ऊपरी स्तर के अधिकारी को सालाना अपनी चल-अचल संपत्ति की जानकारी देनी होगी. मिली जानकारी के अनुसार इस नियम को एक जनवरी, 2021 से लागू कर दिया जाएगा.

क्राइम न्यूज़- राजस्थान के करौली में पुजारी को जलाया, जमीन विवाद में दबंगों ने ले ली जान


राजस्थान के करौली में जमीन विवाद में एक पुजारी को जलाकर मार डाला गया है. आरोप है कि दबंगों ने जमीन पर कब्जा करने के मामले में पुजारी को जलाकर मार डाला.

राजस्थान के करौली में जमीन विवाद में एक पुजारी को जलाकर मार डाला गया है. पुजारी की जलकर जख्मी होने की हालत में अस्पताल में इलाज चल रहा था, जहां पुजारी ने दम तोड़ दिया है. ये पूरा मामला जमीन पर कब्जे को लेकर है. आरोप है कि दबंगों ने जमीन पर कब्जा करने के मामले में पुजारी को जलाकर मार डाला. 

फिलहाल, परिवार जयपुर के एमएसएस अस्पताल के बाहर धरने पर बैठक गया है. मौके पर पहुंचे पुलिस अफसर और परिवार के बीच बातचीत चल रही है. सपोटरा एसएचओ को सस्पेंड करने का निर्णय लिया जा सकता है. साथ ही शव को सुरक्षा में करौली पहुंचाया जायेगा. मामले की जांच के लिए उच्च अधिकारी करौली जा सकते हैं

सीएम बोले- दोषियों पर कार्रवाई होगी

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि सपोटरा, करौली में बाबूलाल वैष्णव जी की हत्या अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण एवं निंदनीय है,सभ्य समाज में ऐसे कृत्य का कोई स्थान नहीं है. प्रदेश सरकार इस दुखद समय में शोकाकुल परिजनों के साथ है. घटना के प्रमुख आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है एवं कार्रवाई जारी है. दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.
  
इस मामले में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने ट्वीट कर कहा, ‘करौली में एक मंदिर के पुजारी को जिंदा जला देना राजस्थान की दुर्दशा का हाल बता रहा है. अशोक जी राजस्थान को बंगाल बनाना चाहते हैं या राज्य  जिहादियों को सौंप दिया है या इसका भी ठीकरा अपने राजकुमार की तरह मोदी जी या योगी जी पर फोड़ोगे?’

क्या है पूरा मामला
करौली के बुकना गांव में पुजारी को जलाकर मार डाला गया है. कल बुधवार शाम इलाज के दौरान जयपुर के एसएमएस अस्पताल में पूजारी की दर्दनाक मौत हो जाने से राजधानी जयपुर सहित करौली जिले में पुजारियों और ब्राह्मण समाज द्वारा घटना का जबरदस्त विरोध किया जा रहा है. 

ब्राह्मण समाज, पुजारी संघ,  ब्राह्मण समाज, बजरंग दल, भाजपा कार्यकर्ताओं ने पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन देकर आरोपियों को शीघ्र गिरफ्तार कर उन्हें  कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की मांग की है. इसके साथ ही पीड़ित परिवार को 50 लाख रुपये का य और एक सरकारी नौकरी देने की मांग की गई है. आंदोलन की चेतावनी दी गई है.

इधर घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक मृदुल कच्छावा ने 6 स्पेशल टीम गठित कर घटना के मुख्य आरोपी कैलाश मीणा को गिरफ्तार कर लिया, वहीं अन्य आरोपियों की तलाश जारी है.

बायो फ्यूल से जल्‍द दौडेंगे वाहन


रतनजोत से बायो फ्यूल के लिए सहायक

रतनजोत से बायो फ्यूल का उत्पादन कर राज्य को प्रदूषित मुक्त करना राज्य सरकार के लिए दूर की कौड़ी साबित हो रहा है।

राजस्‍थान में वाहनों का बायो डीजल हुआ सरकार के लिए दूर की कौड़ी

Multapi Samachar

रतनजोत से बायो फ्यूल का उत्पादन कर राज्य को प्रदूषित मुक्त करना राज्य सरकार के लिए दूर की कौड़ी साबित हो रहा है। सरकार ने रतनजोत की खेती को प्रोत्साहन देने के कई प्रयास किए, लेकिन इसकी खरीद दर कम होने के कारण किसानों में इसके प्रति रुझान कम है। एेसे में सरकार के पास ज्यादा से ज्यादा पौधों को लगाकर उत्पादन कर फ्यूल प्राप्त करना ही उपाय रहा गया है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने बायो फ्यूल को प्रोत्साहन देकर वर्ष 2022 तक डीजल की खपत 10 फीसदी कम करने का लक्ष्य रखा है।

सरकार की समितियों ने रतनजोत की खरीद दर 12 रुपए प्रति किलोग्राम निर्धारित की है, वहीं राजस संघ इसे 15 रुपए व मंडी समितियां 18 रुपए प्रति किग्रा की दर से खरीद रही है। एेसे में सरकार की मुश्किल यह है कि रतनजोत का ज्यादा मात्रा में कैसे संग्रहण किया जाए, क्योंकि काफी कम संख्या में इसकी खेती कर रहे किसान भी अच्छे दाम पाने के लिए कृषि उपज मंडियों का रुख कर रहे हैं।

अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने इस बारे में केन्द्र सरकार से बात की गई थी, तो सरकार का कहना है कि किसानों को बाध्य नहीं कर सकते, वे जहां चाहे उत्पाद को बेच सकते हैं। एेसे में सरकार के पास एक ही विकल्प है कि इसके अधिक-अधिक पौधे को लगाकर उत्पादन करें। सरकार ने अभी तक इसको अनुपयोगी भूमि पर ही लगाया है, कृषि भूमि पर इसकी खेती पर कोई चर्चा नहीं हुई।

अधिकारियों के अनुसार सरकार इसकी खरीद मूल्य को भी बढऩे में सक्षम नहीं है। वर्तमान में इसका खरीद मूल्य 12 रुपए प्रति किग्रा है, जिसे 15 रुपए प्रति किग्रा तक खरीद सकते हैं। एेसे में प्लांट में फ्यूल बनाने के लिए मशीन, मजदूर, बिजली आदि खर्चों के बाद एक लीटर बायो फ्यूल की सरकारी लागत करीब 38 रुपए एवं निजी कम्पनी की लागत 40 रुपए आती है जिसे 44 रुपए प्रति लीटर में बेचा जाता है। अगर इसका खरीद मूल्य कृषि उपज मंडी के बराबर किया जाता है लागत बढ़ जाएगी। एेसे में कम मूल्य पर बायो फ्यूल प्राप्त करना आसान नहीं होगा। जानकारों को कहना है कि उदयपुर संभाग में भारी मात्रा में रतनजोत का उत्पादन होता है, जिसमें से मात्र 10-15 प्रतिशत ही उपयोग हो पा रहा है। सरकार इस ओर ध्यान दे तो बायो फ्यूल उत्पादन बढ़ सकेगा। हालांकि राजस संघ के अधिकारियों का कहना है कि मात्र 10 प्रतिशत की रतनजोत बच पाती है बाकि उपयोग में आ रही है।

अब होगी नीलामी शुरू

एकमात्र वन उपज मंडी उदयपुर में कुछ मात्रा में ही नीलामी हो पाती है। जल्द ही ढंग से नीलामी शुरू होगी, जिससे रतनजोत का भाव बढ़ेगा। इससे किसान और उत्पाद मंडी की ओर आकर्षित होंगे, मगर यह स्थिति भी सरकारी स्तर पर बायो फ्यूल उत्पादन की मुश्किलें बढ़ाएगी।

कृषि उपज मंडी

व न उपज मंडी के बनने के 18 माह में 17-20 रुपए किलो ग्राम के अनुसार कृषि उपज मंडी ने 1 करोड़ 70 लाख रुपए की 10731 क्विंटल रतनजोत की खरीद-फरोख्त हुई जिससे 2 लाख 71 हजार रुपए की मंडी शुल्क प्राप्त की। सर्वाधिक आवक अक्टूबर व दिसम्बर में होती है।

12 जिलों से प्राप्त किया रतनजोत (मेट्रिक टन में)

2011-12 90.709

2012-13 103.390

2013-14 1100

2014-15 2144.73

2015-16 1005

राजस संघ उदयपुर ने इतना प्राप्त किया

2009-10 7889.32 12 रुपए किग्रा

2010-11 738 9.30 रुपए किग्रा

2011-12 907 12 रुपए किग्रा

2012-13 83 15 रुपए किग्रा

(क्विंटल में)

राजस संघ के दायरे में

कोटड़ा, झाड़ोल, सलूम्बर, सिरोही (आबू रोड), गोगुंदा, कुम्भलगढ़, पीपलखूंट, घाटोल, घंटाली, रवागुड़ा, कुशलगढ़, प्रतापगढ़ आदि।

जिले में काफी मात्रा में रतनजोत का उत्पादन हो रहा है। मंडी ने भी कई गुना ज्यादा रतनजोत की खरीदी की है। आने वाले समय में पूर्णत: नीलामी प्रक्रिया होने के बाद किसानों को अच्छा भाव मिल पाएंगा।

भगवान सहाय जाटवा, सचिव, कृषि उपज मंडी, उदयपुर

बाजार मूल्य को ध्यान में रखकर ही समिति की ओर से मूल्य का निर्धारण किया जाता है। इसे फ्यूल के अलावा दूसरे उपयोग में भी लिया जाता है। इसका व्यापार करने के लिए किसानों को बाध्य नहीं कर सकते।

सुरेन्द्रसिंह राठौड़, बायोफ्यूल प्राधिकरण।

मुलतापी समाचार

रानी पद्मावती और चित्तौड़गढ़ का इतिहास


ईसवी सन 1303 में रानी पद्मावती ना मिल पाने व उसकी मृत्यु से अलाउद्दीन खिलजी पागल सा हो गया था। वह अपने को छला हुआ महसूस करने लगा था। पूरे 8 माह युद्ध के बाद भी वह पद्मावती को ना पा सका। किंतु अब चितौड़ उसके अधीन था।

रानीपद्मावती की जौहर अग्नि ।
खिलजी को कर गयी छलनी ।।

इसके पश्चात मध्य व दक्षिण भारत में विजय के लिए उसने अपने सेनापति मुल्तानी को भेजा। सन 1305 ईसवी में मालवा पर अधिकार करने के लिए खिलजी की सेना आगे बढ़ी। उस समय मालवा पर पंवार राजा महलक देव का राज था। जैसे ही खबर मिली कि खिलजी की विशाल सेना मालवा पर अधिकार करने आ रही है, राजा महलक देव ने तुरंत सेना तैयार की और युद्ध के लिए रवाना हो गए। उन्होंने खिलजी की सेना को रतलाम के पास ही रोक लिया। दोनो सेनाओं में युद्ध होने लगा। राजा महलक देव के नेतृत्व में पंवार सैनिक कुशलता से लड़ रहे थे। पंवारो से युद्ध मे खिलजी की सेना के होश उड़ गए। उस युद्ध मे अब तक 700 मुस्लिम सैनिक मारे जा चुके थे तो वही पंवारो के 500 सैनिक। खिलजी के सेनापति ने अपने सैनिको को हिम्मत हारते देख तुरंत सैनिक सहायता की मांग की खिलजी ने तुरंत सैनिक भेज दिये और साथ ही अच्छे हथियार भी पहुचाये गये।और सैनिक टुकड़ी आते देख पंवार सैनिकों में अफरा तफरी मच गई। राजा महलक देव ने सैनिकों को पीछे हटने का आदेश दिया। क्योंकि ख़िलजी के सैनिक संख्या में ज्यादा थे साथ ही उनके पास अन्य सैनिको द्वारा अच्छे हथियार लायें गये थे। बचे हुए सैनिक और राजा महलक देव पीछे लौटते हुये मांडू आ गये। उस युद्ध मे मरे हुये सैनिको के साथ 12 बाई सती हो गई थी।राजा महलक देव के पीछे हटने के बाद भी खिलजी की सेना ने उनका पीछा किया और मांडू तक आ गये। वहाँ भी युद्ध होने लगा। सेनापति मुल्तानी ने राजा महलक देव को मार दिया। राजा महलक देव की मृत्यु से पंवार सैनिकों में अफरा तफरी मच गई। मांडू को घेर लिया गया। सभी पवाँर सैनिक वहाँ से भागने लगे। इस हार से पंवारो ने अपनी आन बान और संस्कृति बचाये रखने के लिए मालवा क्षेत्र से पलायन का विचार किया। कुछ पंवार धार के आस पास के गांव में बस गए। पंवारो ने राजा महलक देव के पुत्र संजीव कुमार को धारा नगरी का नया राजा घोषित किया गया। ( इतिहास में वर्णित आधार पर)

रतलाम युद्ध मे हार के बाद पवाँर सैनिक अपने साथ जरूरत के सामान ले अपने-अपने परिजनों के साथ वहाँ से पलायन कर नर्बदा किनारे वर्तमान पवारखेड़ा( होशंगाबाद) तक आये और वहाँ से नर्बदा जी को पार कर पहला पड़ाव डाला। जिसमें 72 कुल के लोगो ने पलायन किया था।। युद्ध से थके हारे सैनिक और उचित खान पान की व्यवस्था ना हो पाने के कारण बच्चे, बूढे और महिलाएं बीमार होने लगीं। तभी कुछ बुजुर्गों ने इस बीमारी को देवी का प्रकोप समझ पूजा भंडारा की सलाह दी। सभी पंवारो ने मिल कर चंदा जमा किया जिससे 1200 रुपये जमा हुए। इन पैसों से विशाल भंडारा व देवी पूजा की गई। जिसमें आस पास के बहुत से लोग शामिल हुए थे।(भाट से मिली जानकारी पर) पंवारो ने जहाँ पहला पड़ाव डाला था वह स्थान पवारखेड़ा नाम से जाना जाने लगा। अपने मूल स्थान से नये वातावरण में भटके शाकाहारी धार्मिक पवाँर जाती दिनों दिन दुर्बल होती जा रही थी। उन्होंने वहाँ से सतपुडा के जंगलों में आगे बढ़ते हुए दूसरा पड़ाव वर्तमान धार गांव में डाला। कहाँ वह राजसी ठाठ बाट और कहाँ यह वनवासी जीवन पवाँर जाति की हालत में अब भी कोई ज्यादा सुधार नही हुआ था। रतलाम युद्ध मे घायल कुछ लोग मर चुके थे जिसके कारण स्थति दयनीय थी। जंगलों में रहने वाले गोंड जाति के लोग दुबले पतले पंवार को देख उन पर हँसते औऱ मांस मदिरा सेवन की बात बताते। उस समय गोंड जाति जंगलों में शिकार व महुआ की दारू का सेवन करती थी। जंगल के वातावरण में यह भोजन उनके अनुकूल भी था। इन जंगलों में शाकाहारी जीवन शरीर के लिए अनुकूल ना होने के कारण कुछ बुजुर्गों ने मांस व मदिरा का भक्षण उचित समझा।

उस समय वहाँ के गोंड राजा नरसिंह राय प्रथम थे। उन्हें खबर मिली कि कुछ राजपूत सैनिक युद्ध में हारकर उनके राज्य में आये हैं तो वे उनसे मिलने आये उनकी दुर्बलता को देख उन्होंने भी मांस खाने की सलाह दी। पवाँर लोगो ने धार गांव के समीप ही जनेऊ को निकाल कमर में बांध लिया तो कुछ लोग जनेऊ को नर्मदा जी मे प्रवाहित कर आये।राजा नरसिंह राय राजपूत लोगो की शक्ति से भली भांति परिचित थे। उन्होंने पंवारो को अपनी राजधानी बुलाया और सभी की अच्छी आवभगत करी। और वही बस जाने को कहाँ। वह क्षेत्र बदनूर (वर्तमान बैतूल ) के पास था। गोंड राजा ने उन्हें महाजन करके संबोधित किया और गाँव बसाने के लिए जमीन दान दी। वर्तमान में बैतूल के पास रोंढा , भडूच, बैतूल बाजार , खेड़ी, गाँव मे आज भी पवाँर अपने महाजनी ठाठ बाट से रहते हैं। और अपने को महाजन बताते हैं। गोंड राजा से मित्रता के बाद पंवारो ने उनकी मदद का आश्वासन दिया। खेड़ला किला का निर्माण राजा नरसिंह राय ने 14 वी सदी में किया था। जिसमे पवाँर जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्तमान में यह किला खंडहर का रूप के चुका है। यहाँ खजाने की खोज में कई बार खुदाई की गई है। खुदाई से पता चला है कि वहाँ सूर्य मंदिर भी था। सूर्य मंदिर पंवारो के अग्नि उपासक होने के प्रमाण है। भले ही राज्य छूट गया पंरतु वे अपनी सांकृतिक विरासत को कभी नही भूले। अपनी बोली, पहनावा, रीति रिवाज नही भूले ।

बैतूल से आगे बढ़ते हुये पवाँर समाज ताप्ती उदगम मुलताई तक पहुँच गये। वहाँ उन्होंने कई गांव बसाए जैसे चन्दोरा, खैरवानी, ढोब सिलादेही , जोलखेड़ा आदि। तो कुछ लोग देवगढ़ की ओर आगे बढ़े तो कुछ परतवाड़ा, वर्धा नदी के किनारे जा बसे। ( पूरी जानकारी मिलने पर आगे लिखुंगा)
धन्यवाद
मनोज देशमुख
जानकारी स्त्रोत- राजेश जी बारंगे
इतिहास की किताबें

मुलतापी समाचार द्वारा प्रस्‍तुत