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ह‍िन्‍दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष आत्‍मकथा – उमर एक दिन


उमर एक दिन

आत्‍मकथा – उमर एक  दिन

अशोक (श्री) बैतूल

चलता हूँ इसलिये कि जीना है, एक दिन।

कमबख्त जीने की चाह ने, दौड़ना सिखा दिया।।

मुलतापी समाचार

                 सारे दिन की भाग-दौड़ के साथ उत्‍तर-दक्षिण पूरब-पश्चिम की सारे जहाँ से कुछ खट्टी कुछ मीठी नरम-गरम कच्ची-पक्की बुलवाकर चुनिंदा हाथों से जब मेरा अंग-अंग तैयार किया जाता है और जैसे ही रात्रि के पहले पहर के अंतिम चरणों में समय के प्रहरी आपस में आलिंगन कर एक होते हैं तभी ठीक रात्रि के बारह बजे मेरा जन्म होता है।

                 वाह रे मेरी किस्मत तो देखो, मेरे बाहर आते ही मेरा मालिक मेरा सम्राट मेरा जन्मदाता गौर से ऊपर से नीचे तक मुझे निहारता है, कि मुझमें कोई कमी तो नहीं, फिर क्या पूछना जैसे ही मै अपने वास्तविक रूप में आता हॅू मेरी सेवा में मेरे ही घरों के सामने एक से एक गाड़ियाँ मेरी प्रतिक्षा में खडी रहती है कोई में लिखा होता है- रोको मत जाने दो और कोई में नान स्टाप कार्ड लगाये मेरा इंतजार करते रहती हैं, जैसे ही मै उस पर सवार होता हूं

                 गाड़ियाँ बिना रोक-टोक सुनसान सड़कों पर रातों-रात मेरी मंजिल की ओर लेकर मुझे लेकर दौड़ने लगती, कोई मुझे बस में बैठाता, कोई टेन में तो कोई एरोप्लेन में। मेरे पहुँचते ही सुबह-सुबह ब्रह्म मुहुर्त में सूरज की पहली किरणों के साथ लोग मुझे दोनों हाथों में लेकर मेरा स्वागत करते मुझे बहुत आनंद आता है। वैसे मुझे आग-पानी से डर लगता है हवा सहन नहीं होती, फिर भी जब सुबह-सुबह चाहे ठण्डी हो या गर्मी या हो बरसात लोग मुझे साईकल/मोटर साईकल में कोई हाथ पकड़कर मेरे चाहने वाले के घर छोड़कर आते हैं। मुझे अपने आप पर गर्व है कि मैं कितना खुशनसीब हू कि मुझे बिना किसी पास के राष्ट्रपति/ प्रधानमंत्री/ मुख्यमंत्री आई.ए.एस. आई.पी.एस. एवं सभी VIP के घरों में आफिसों में डायरेक्ट एन्ट्री मिलती है। मेरे पहुँचते ही इन लोगों के पास किसी से मिलने के लिये समय हो या न हो इतनी व्यस्तता के बाद भी रोज सुबह मेरे लिये अपना अमूल्य समय निकालकर चाय नाश्ते के साथ मुझे भरपूर समय देते हैं तब मेरा सर गर्व से और भी ऊँचा हो जाता है।

                 मुझे हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई अमीर-गरीब महल हो या अटारी या हो झुग्गी-झोपड़ी किसी के भी घर में जाने में मुझे कोई शर्म नहीं आती क्योंकि मुझे मालूम है मेरी उम्र सिर्फ एक दिन है। फिर अमीर-गरीब छोटा-बड़ा ऊँच-नीच जात-पात में अन्तर करने में अपना समय क्यों गवाऊँ मेरा उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों से मिलूँ इतनी छोटी सी उम्र में मैं जितने अधिक से अधिक लोगों से मिलूँगा उतनी ही तृप्ती मुझे मिलेगी।

                 जब मैं ट्रेनों में बसों में सफर करता हूँ तो लोग मेरी दोनों बाहें पकड़े कोई मेरी कमर पकड़े कोई मुझे गोदी में बिठाये अपना मनोरंजन करते हैं समय काटते हें और मैं कभी इसके पास कभी उसके पास मुझे तो बहुत मजा आता है।

कोई-कोई तो मुझे देखने के बाद मेरे हाथों में गरम-गरम जलेबी-समोसे रखकर मुझे जायका दिलाते हैं।

                 मुझे उस समय बेहद शर्म आती है जब घरों में लोग दिन में अपना सारा काम करने के पश्चात् दोपहर में पलंग पर लेटकर अपने कोमल-कोमल हाथों से कोई मेरी बांहें पकड़े कोई कमर पकड़े मुझे निहारती हैं और थोड़ी देर बाद निहारते-निहारते मुझे अपने ऊपर लिटाये और खुद सो जाती है मुझे घबराहट और बेचैनी होती है, मैं सोचता हूं- हे भगवान कोई कब जल्दी आये और मुझे इनसे छुड़ा के ले जायें।

                 मेरा हृदय जब गद्-गद् हो जाता है, देश की सीमा पर तैनात भारत माँ के सपूत मुझे देखते हैं दौड़ पड़ते हैं उनके हाथों के स्पर्श से मैं धन्य हो जाता हूं और सोचता हूं कि मेरा जीवन धन्य हो गया।

                 मजे की बात तो यह है मि मेरे मालिक मेरे ’’सम्राट’’ के हाथ में जो (कलम) तलवार है वो लकड़ी की है जिससे बिना खून-खराबे के सिर्फ चारों तरफ घुमाने से ही लोगों के रूके हु काम होने लगते हैं तभी तो मैं नेता-अभिनेता की शान और गरीबों का मसीहा माना जाता हूँ।

                 मुझे उन दरिंदों पर बेहद ख़ौफ आता है जो मेरे नाम पर अपनी (कलम) तलवार को बेच देते हैं अपना वज़ूद गिरवी रख देते हैं मेरी भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं अपना उल्लू सीधा करते हैं ऐसे मालिक से तो मन करता है इनकी गुलामी से बंद हो जाना या बलिदान हो जाना बेहतर होगा।

                 लोग मेरी उम्र बढ़ाने की बहुत कोशिश करते हैं कोई सोचता है 7 दिन तो कोई सोचता 15 दिन हो जाये, लेकिन मुझे मालूम है मेरी उम्र सिर्फ एक ही दिन की है। कल फिर मेरा ही मालिक किसी दूसरे को जन्म देगा उसकी भी यही आत्मकथा होगी। मैं लम्बी उम्र के बजाय एक दिन की शान की जिन्दगी जीना ज्यादा बेहतर मानता हूंं।

                 मेरे मालिक मेरी रोज की रंगीन/ब्लेक एण्ड व्हाईट तस्वीरें इतिहास के झरोखों में दिखाने के लिये संजो कर रखते हैं। मैंने अपनी आत्मकथा सुना डाली लेकिन अपना नाम नहीं बताया मैं आपकी बाहों में समाया हूं आप मुझे सम्हालिये फिर मैं आपको अपना नाम बताता हूँ। मुझे याद है सबसे पहले मैं बनारस में आज के नाम से निकला फिर अब तो क्या पूछना कोई मुझे मुलतापी समाचार, भास्कर, नवभारत, कोई लोकमत कोई नई दुनिया से पुकारता है। अंग्रेजी में मेरा नाम है- क्रानिकल टाईम्स आफ इण्डिया उर्दू में हितवाद और पंजाब में पंजाब केसरी उजाला सहारा। हर प्रान्त में वहां का लाड़ला माना जाता हूँ। अब यह आपकी मर्जी कि आप मुझे क्या नाम क्या ईनाम देते हैं।

                 आपको मालूम है मेरी उम्र सिर्फ एक दिन है मुझे आपके हाथों में देखते हुये मुझे बड़ा फक्र महसूस हो रहा है, लेकिन मुझे जब ज्यादा तृप्ती मिलेगी, मेरी आस्था और बढ़ेगी जब आप मुस्कुराकर मुझे सुरक्षित किसी और के हाथों में दे दें।

                                                                              अशोक (श्री) बैतूल

आंसू बहाती गई, इतिहास रचता गया….


आत्‍मकथा

मैं अकेली थी और वे चार थे

आंसू बहाती गई इतिहास रचिता गया इस लंबे सफ़र में 2651 दिन घुट घुट के आंसू बहाती गई इतिहास रचता गया मैंने ठान रखा था

मैं टूटूगींं तो इन चारों हत्यारों को लेकर टूटूगींं निर्भया की सिसकती आहें मुझे सोने नहीं देती थी

मेरी तो अंतिम इच्छा ही यह थी मैं तो इन चारों हत्यारों को लेकर ही टूटूगींं आगे पढि़ए

आंसू बहाती गई इतिहास रचा गया

मैं अपने पुराने दिनों को याद करती हैं, तो आश्चर्य होता है कि जब में बिना पिये दो-चार कदम भी नहीं चल पाती थी. अब तो मैं समय के साथ-साथ इतनी बदल गई है, जैसे रेगिस्तान में ऊँट एक-एक माह का पानी एक साथ पीकर लगातार चलता जाता है।

वैसे में अपनी व्यथा क्या सनाऊँ मैं तो वो मनचली हूँ, जिसने मुझे थामा बस उसकी ही उंगलियों थामें उसके भविष्य को संवारने में लग जाती हूँ। मेरे लिये न तो कोई उम्र की सीमा है. ना जाति का बंधना मुझे न तो कोई अमीर से लगाव है और न गरीब से परहेज, मैं तो स्वच्छन्द विचारों वालों के हाथों की कठपुतली हूँ, जो उसकी खुशी, गम, जज़बात, भावना और विचारों के अनुसार नाचती, आँसू बहाती जाती हूँ और इतिहास रचती जाती हूँ।

अक्सर मुझे लोग अपने दिल से लगाकर रखते हैं, हर कोई अपने दिल-दिमाग को संतुलित कर मुझे अपने हाथों में थामे अपनी कहानी, व्यथा सुनाता जाता है और मैं उसकी उंगलियाँ थामे आँसू बहाती चलती जाती हूँ। मैं तो वह दिवानी हूँ, जिसकी पनाह में जाती हूँ, उसका ही अस्तित्व बनकर रह जाती हूँ। ऋषि-मुनियों के हाथों लगी तो वेद और शास्त्र बन गये। न्याय के पुजारी ने छुआ तो न्याय का इतिहास रचती चली गई। कमजोर गरीब असहाय की तो अर्जी बन न्याय का दरवाजा खट-खटाती चली आ रही हूँ। किसी कलाकार की इच्छा अनुसार उसकी कलाकृति, किसी शायर की मनचाही शायरी और किसी कवि की भावनात्मक कविता, कल्पना और साहित्यकार की रचना रचकर लोगों का दिल जीत रही हूँ। मजे की बात तो यह है कि मैं तो राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री, नेता, राजनेता, आई.ए.एस., आई.पी.एस. की वो ताकत हूँ, जिस रास्ते चली गई, गानों पत्थर की लकीर, तब तो लोग मुझे पूजते हैं, सम्मान देते हैं। नन्हें-मुन्ने बच्चे बड़े ही लगाव से अपनी नाजुक, नन्हीं-नन्हीं कोमल उंगलियों में थामे मुझे चलाने का प्रयास करते हैं और मैं उनका भविष्य संवारने में पूरा-पूरा सहयोग देती हूँ। गाँवों में कुछ महिला, बड़े-बूढ़े जब कभी पहली-पहली बार शर्माते हुए अपने हाथों में मुझे लेते हैं, तो उनके हाथ कांपने लगते हैं. तब मुझे बड़ा ही अजीब अहसास होता है। मुझे थामने वालों को, सभी को अपना सम्राट मानती हूँ और उसके इशारों पे नाचती हूँ, पर जब मैं लोगों को मेरे इशारे पर नाचता देखती हूँ तो मुझे बेहद खुशी के साथ-साथ पूर्ण तृप्ति मिलती है और मुझे अपनी अहमियत का पता चलता है। मेरी तो सदा उनके प्रति आस्था (श्रद्धा) रहती है, जो मुझे सही राह पर चलाते हैं।

मुझे अपने आप पर फक्र है, मैं टूटती भी हूँ तो पहले किसी हत्यारे के नाम मौत का पैगाम (Hanging till Death ) “हैगिंग टिल डैथ” लिख मेरे न्यायप्रिय सम्राट के हाथों मेरा रार-कलग कर दिया जाता है। वॉह रे मेरी किस्मत, मैं कोई और नहीं आपके हाथों की ही एक कलम हूँ।

कलमकार लेखक-श्रीवास अशोक (सम्राट), बैतूल

Mr Ashok Shrivash, Betul