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मप्र / 20 लाख बच्चों के 160 करोड़ रु. के नाश्ते पर नजर; एक ही समूह को जिम्मेदारी देने की तैयारी


सांझा चूल्हा व्यवस्था में कुछ जिलों से शिकायतें थीं कि नाश्ता नहीं मिल रहा। इसलिए प्रस्ताव तैयार किया

पोषण आहार पर खींचतान के बीच एक और व्यवस्था बदलने का प्रस्ताव

भोपाल | पोषण आहार की नई व्यवस्था को लेकर मची खींचतान के बीच प्रदेश की करीब 97 हजार आंगनवाड़ियों में 3 से 6 साल के बच्चों को हर दिन बंटने वाले पके हुए नाश्ते  (खिचड़ी-लप्सी) की व्यवस्था को बदलने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। महिला एवं बाल विकास संचालनालय द्वारा तैयार प्रस्ताव में नाश्ता वितरण की जिम्मेदारी स्व सहायता समूहों के हाथ से लेकर हर जिले में किसी एक समूह को देनी की बात है। हालांकि शासन ने यह प्रस्ताव संचालनालय को फिलहाल यह कहकर लौटा दिया है कि वे शिकायतों को दूर करने के प्रयास करें।

फैक्ट फाइल 
1. मप्र में इस समय 84 हजार आंगनबाड़ी व 13 हजार सहायक आंगनबाड़ियां हैं। इनमें 28 लाख बच्चे पंजीकृत हैं। 
2. करीब 8 लाख शहरों में हैं, जबकि गांव में 20 लाख बच्चे हैं। 
3. शहरों में केंद्रीयकृत किचन है, जबकि गांवों में यह काम 20 से 30 हजार स्व सहायता समूहों के पास है। 
 
प्रस्ताव का परीक्षण चल रहा
‘स्कूलों और आंगनबाड़ियों के लिए एक ही स्व सहायता समूह नाश्ता व खाना बनाते हैं। इस सांझा चूल्हा व्यवस्था में कुछ जिलों से शिकायतें थीं कि नाश्ता नहीं मिल रहा। इसलिए प्रस्ताव तैयार किया, जिसका परीक्षण चल रहा है। – नरेश पाल, आयुक्त, महिला एवं बाल विकास

अभी जिले में 300 से ज्यादा स्वसहायता समूह के पास ये जिम्मेदारी

बदलाव इसलिए… 

  • सालाना करीब 160 करोड़ रुपए के बजट वाली नाश्ता व्यवस्था को संचालनालय इसलिए बदल रहा है, क्योंकि उसके पास स्व सहायता समूहों के खिलाफ कई शिकायत मिली हैं।
  • करीब 20% शिकायतें है कि उन्हें नाश्ते की बजाए सीधे खाना मिल रहा है। लिहाजा जिले में काम कर रहे 300-400 स्वसहायता समूहों की बजाए किसी एक समूह को जिले का काम सौंप दिया जाए।

खर्च का गणित…

  • विभाग आंगनवाड़ी में पोषण आहार के अलावा नाश्ते और खाने में पकी हुई सामग्री देता है।  प्रति बच्चा कुल खर्च 8 रुपए।  नाश्ते पर 3 और खाने पर 5 रुपए ।
  • शहरों को छोड़ दें तो गांवों में इस समय 20 लाख बच्चे नाश्ता और खाना खाते हैं।
  • यानी नाश्ते पर प्रति दिन 60 लाख रुपए और एक माह में 14 से 15 करोड़ और साल में 160 से 180 करोड़ रुपए खर्च होते हैं।

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