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बेटी की शादी कहीं भी कर देने पर वह कहीं की नहीं रह जाती


मुलतापी समाचार

बेटे-बेटी की शादी मुक्त होने के लिए नहीं,संयुक्त होने के लिए करें

विवाह और युद्ध में की गई गलती कभी ठीक नहीं होती
भोपाल। बेटी के विवाह योग्य होते ही उसके विवाह को लेकर माता-पिता का चिंतित होना स्वाभाविक है। चिंता के साथ साथ यह एक दायित्व और संस्कार भी है। बेटी की शादी कहीं भी कर देने पर वह कहीं की नहीं रह जाती है, अतः बेटी के विवाह में सावधानी गंभीरता और दायित्व बोध का होना जरूरी है। कहा भी जाता है विवाह और युद्ध में की गई गलती कभी ठीक नहीं होती।

सामान्यतः जो सावधानी, जो गंभीरता ,जो दायित्वबोध विवाह को लेकर माता-पिता के मन में होना चाहिए, सामान्यतः बेटी के विवाह के समय यह कम ही देखने को मिलता है। बेटी का विवाह जब मुक्त होने के लिए अधिक और संयुक्त होने के लिए कम किया जाता है तब सामान्यतः विवाह कम सफल होते पाए जाते हैं।
कुछ अपवादों को छोड़कर
आज भी समाज में बेटी को बोझ मानने वाले माता-पिताओं की कमी नहीं है। अपना राजपाट सौंपने की चाह में अपने उत्तराधिकारी के लिए बेटियों की लाइन लगाने वाले हों या बेटियों को बोझ समझने वाले माता-पिता हों बेटियों को बेटे की तरह समझने का प्रयास करेंगे और सम्मान देने का प्रयास करेंगे तो बेटियों के जीवन में जाने-अनजाने जो ग्रहण लग जाता है उससे कुछ हद तक छुटकारा पाया जा सकता है।
कई माता-पिता झूठ बोलकर अपने बेटे -बेटियों का विवाह करने में भी संकोच नहीं करते। ऐसे माता-पिता अपने बच्चों के जीवन में स्वर्ग कम नर्क ज्यादा सृजित करते हैं। आज भी झूठ बोलकर शादी करने वाले एक दूसरे परिवार से संयुक्त होने की अपेक्षा कैसे भी विवाह करके अपने को मुक्त करने में ज्यादा रुचि लेते प्रतीत होते हैं।
बेटे वाले भी झूठ बोल कर शादी करने के मामले में पीछे नहीं होते। बेटी वाले संकोचवश अधिक जानकारी ले नहीं पाते और विवाह के बाद हकीकत सामने आने पर केवल पछतावा ही हाथ लगता है। समाज में विवाह के सफल होने का प्रतिशत कम होने में इस तरह की सोच का भी महत्वपूर्ण हाथ होता है।
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